Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 853

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता꣡ हु꣢वे꣣ य꣡यो꣢रि꣣दं꣢ प꣣प्ने꣡ विश्वं꣢꣯ पु꣣रा꣢ कृ꣣त꣢म् । इ꣣न्द्राग्नी꣡ न म꣢꣯र्धतः ॥८५३॥

ता꣢ । हु꣣वे । य꣡योः꣢꣯ । इ꣡द꣢म् । प꣣प्ने꣢ । वि꣡श्व꣢꣯म् । पु꣣रा꣢ । कृ꣣त꣢म् । इ꣣न्द्रा꣢ग्नी । इ꣣न्द्र । अग्नी꣡इति꣢ । न । म꣣र्धतः ॥८५३॥

Mantra without Swara
ता हुवे ययोरिदं पप्ने विश्वं पुरा कृतम् । इन्द्राग्नी न मर्धतः ॥

ता । हुवे । ययोः । इदम् । पप्ने । विश्वम् । पुरा । कृतम् । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । न । मर्धतः ॥८५३॥

Samveda - Mantra Number : 853
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ता-इन्द्राग्नी हुवे) मैं उन दोनों नामों से कहे जाने वाले ऐश्वर्यवान् बलशाली एवं ज्ञानप्रकाशवान् अग्रणेता परमात्मा को आमन्त्रित करता हूँ (ययोः पुरा कृतं विश्वं पप्ने) जिसका प्रथम किया—रचा विश्व—संसार प्रशंसित किया जाता है (न मर्द्धतः) जो पीड़ा नहीं देता है ‘मृध हिंसायाम्-छान्दसः।’
Essence
ऐश्वर्यवान् और ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा का रचा प्रवाह से पुराना संसार प्रशंसित किया जाता है वह परमात्मा उपास्य देव है जो उपासकों को पीड़ित नहीं करता है॥१॥
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (अमृत अन्न को धारण करने वाला उपासक)॥ देवता—इन्द्राग्नी (ऐश्वर्यवान् एवं ज्ञानप्रकाशक परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥