Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 851

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡दह꣢꣯ स्व꣣धा꣢꣫मनु꣣ पु꣡न꣢र्गर्भ꣣त्व꣡मे꣢रि꣣रे꣢ । द꣡धा꣢ना꣣ ना꣡म꣢ य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥

आ꣢त् । अ꣡ह꣢꣯ । स्व꣣धा꣢म् । स्व꣣ । धा꣢म् । अ꣡नु꣢꣯ । पु꣡नः꣢꣯ । ग꣣र्भत्व꣢म् । ए꣣रिरे꣢ । आ꣣ । इरिरे꣢ । द꣡धा꣢꣯नाः । ना꣡म꣢꣯ । य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥

Mantra without Swara
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे । दधाना नाम यज्ञियम् ॥

आत् । अह । स्वधाम् । स्व । धाम् । अनु । पुनः । गर्भत्वम् । एरिरे । आ । इरिरे । दधानाः । नाम । यज्ञियम् ॥८५१॥

Samveda - Mantra Number : 851
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(आत्-अह) बस, अन्तर—परमात्मसदृश गुण प्राप्त कर मुक्त गण (स्वधाम्-अनु) अपनी धृति—स्थिति के अनुसार (पुनः-गर्भत्वम्-एरिरे) पुनः परमात्मा के गर्भभाव को प्राप्त हो जाते हैं उसके अन्दर विराजमान हो जाते हैं (यज्ञियं नाम दधानाः) सङ्गमनीय आत्मसमर्पण नम्रभाव को धारण करते हुए।
Essence
उपासना से उपासकजन उपास्य परमात्मा के गुण धारण कर अपने धृति स्थिति—स्व ज्ञान गति के अनुसार परमात्मा के अन्दर पुनः प्राप्ति अनुभव करते हैं जैसे संसार में आने से पूर्व मोक्ष में रहते थे सङ्गमनीय आत्मसमर्पणरूप नम्रीभाव को धारण करते हुए॥२॥
Special