Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 850

1875 Mantra
Devata- मरुत इन्द्रश्च Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रे꣢ण꣣ स꣡ꣳ हि दृक्ष꣢꣯से संजग्मा꣣नो꣡ अबि꣢꣯भ्युषा । म꣣न्दू꣡ स꣢मा꣣न꣡व꣢र्च्चसा ॥८५०॥

इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । सम् । हि । दृ꣡क्ष꣢꣯से । सं꣣जग्मानः꣢ । स꣣म् । जग्मानः꣢ । अ꣡बि꣢꣯भ्युषा । अ । बि꣣भ्युषा । मन्दू꣡ इति꣢ । स꣣मान꣡व꣢र्चसा । स꣣मान꣢ । व꣣र्चसा ॥८५०॥

Mantra without Swara
इन्द्रेण सꣳ हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा । मन्दू समानवर्च्चसा ॥

इन्द्रेण । सम् । हि । दृक्षसे । संजग्मानः । सम् । जग्मानः । अबिभ्युषा । अ । बिभ्युषा । मन्दू इति । समानवर्चसा । समान । वर्चसा ॥८५०॥

Samveda - Mantra Number : 850
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अबिभ्युषा-इन्द्रेण सञ्जग्मानः-हि सं दृक्षसे) भयरहित करने वाले ऐश्वर्यवान् परमात्मा के साथ उपासना द्वारा संगत हुआ तू हे जीवन्मुक्त उपासकगण सदृश—उस जैसा हो रहा है “मरुतो देवविशः” [श॰ २.५.१.१२] (मन्दू समानवर्चसा) यतः अब दोनों समान तेज वाले और आनन्दवान् आनन्दप्रद हो रहे हैं “तेजोऽसि तेजो मयि धेहि” [यजु॰ १२.२] “रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति” [तै॰ उप॰ ब्रह्म॰ अनु॰ ६]।
Essence
भयरहित करने वाले परमात्मा के साथ उपासना द्वारा जीवन्मुक्त उपासकगण संगत हो सदृश प्रतीत होते हैं क्योंकि दोनों समान तेज वाले और आनन्दपूर्ण आनन्दमय हो जाते हैं॥१॥
Special
ऋषिः—मधुच्छन्दाः (मीठी इच्छा वाला)॥ देवता—मरुद्गणः-इन्द्रश्च (ऐश्वर्यवान् परमात्मा और उससे सम्बद्ध जीवन्मुक्त)॥ छन्दः—गायत्री॥