Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 842

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानो꣡ वरि꣢꣯वस्कृ꣣ध्यू꣢र्जं꣣ ज꣡ना꣢य गिर्वणः । ह꣡रे꣢ सृजा꣣न꣢ आ꣣शि꣡र꣢म् ॥८४२॥

पु꣣नानः꣢ । व꣡रि꣢꣯वः । कृ꣣धि । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । ज꣡ना꣢꣯य । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । ह꣡रे꣢꣯ । सृ꣣जा꣢नः । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् ॥८४२॥

Mantra without Swara
पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वणः । हरे सृजान आशिरम् ॥

पुनानः । वरिवः । कृधि । ऊर्जम् । जनाय । गिर्वणः । गिः । वनः । हरे । सृजानः । आशिरम् । आ । शिरम् ॥८४२॥

Samveda - Mantra Number : 842
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः-हरे) हे स्तुतिवाणियों से वननीय सेवनीय दुःखापहरण सुखाहरणकर्ता परमात्मन्! (जनाय) उपासकजन के लिए (पुनानः) उपासक के हृदय में प्राप्त होने के हेतु (वरिवः-ऊर्जं कृधि) भोगधन और अमृतरस—मोक्षानन्द को सम्पादन कर (आशिरं सृजान) मुझे अपने आश्रय में आनन्द प्राप्त करा।
Essence
स्तुतियों से प्राप्त होने वाले दुःखहरणकर्ता सुखाहरणकर्ता परमात्मन्! तू उपासकजन के लिए उसके हृदय में प्राप्त होने के हेतु भोगधन और अमृतरस को मुझे प्राप्त करा॥२॥
Special