Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 84

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳहि क्षैत꣢꣯व꣣द्य꣡शोऽग्ने꣢꣯ मि꣣त्रो꣡ न पत्य꣢꣯से । त्वं꣡ वि꣢चर्षणे꣣ श्र꣢वो꣣ व꣡सो꣢ पु꣣ष्टिं꣡ न पु꣢꣯ष्यसि ॥८४॥

त्व꣢म् । हि । क्षै꣡त꣢꣯वत् । य꣡शः꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न । प꣡त्य꣢꣯से । त्वम् । वि꣣चर्षणे । वि । चर्षणे । श्र꣡वः꣢꣯ । व꣡सो꣢꣯ । पु꣣ष्टि꣢म् । न । पु꣣ष्यसि ॥८४॥

Mantra without Swara
त्वꣳहि क्षैतवद्यशोऽग्ने मित्रो न पत्यसे । त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि ॥

त्वम् । हि । क्षैतवत् । यशः । अग्ने । मित्रः । मि । त्रः । न । पत्यसे । त्वम् । विचर्षणे । वि । चर्षणे । श्रवः । वसो । पुष्टिम् । न । पुष्यसि ॥८४॥

Samveda - Mantra Number : 84
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशमान परमात्मन्! (त्वं हि) तू ही (क्षैतवत्-यशः) क्षिति पृथिवी का—पार्थिव देह, “क्षितिः पृथिवीनाम” [निघं॰ १.१] पार्थिव देहवाले उदक—जीवनरस पर “यशः-उदकनाम” [निघं॰ १.१२] (पत्यसे) स्वामित्व करता है “पत्यते-ऐश्वर्यकर्मा” [निघं॰ २.२१] (मित्रः-न) प्राण के समान “प्राणो वै मित्रः” [श॰ ६.५.१.५] प्राण जैसे शरीरस्थ जीवनरस पर स्वामित्व करता है (विचर्षणे वसो) हे सर्वद्रष्टा वसाने वाले परमात्मन् (त्वम्) तू (श्रवः पुष्टिं न पुष्यसि) मेरे आत्मयश को भी “श्रव इच्छमानः प्रशंसामिच्छमानः” [निरु॰ ११.९] पुष्टि के समान—जीवनरस की पुष्टि के समान पुष्ट करता है—उन्नत करता है।
Essence
हे परमात्मन्! तू अपनी महती कृपा से मुझ उपासक के जीवनरस को प्राण के समान उसे प्रवृद्ध करने वाला है और मेरे आत्मयश को भी पुष्ट-प्रवृद्ध करके अपने आश्रय में वसाने वाला है, मैं किस भावना से तेरी शरण में आने को उत्सुक हूँ यह तू जानता है। अतः मुझे अपनी शरण दे॥४॥
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (परमात्मा के अर्चन ज्ञान बल को धारण करने वाला उपासक)॥