Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 836

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣡ त्वा꣢ नृ꣣म्णा꣢नि꣣ बि꣡भ्र꣢तꣳ स꣣ध꣡स्थे꣢षु म꣣हो꣢ दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢ꣳ सुकृ꣣त्य꣡ये꣢महे ॥८३६॥

त꣢म् । त्वा꣣ । नृम्णा꣡नि꣢ । बि꣡भ्र꣢꣯तम् । स꣣ध꣡स्थे꣢षु । स꣣ध꣡ । स्थे꣣षु । महः꣢ । दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢꣯म् । सु꣣कृत्य꣡या꣢ । सु꣣ । कृत्य꣡या꣢ । ई꣣महे ॥८३६॥

Mantra without Swara
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतꣳ सधस्थेषु महो दिवः । चारुꣳ सुकृत्ययेमहे ॥

तम् । त्वा । नृम्णानि । बिभ्रतम् । सधस्थेषु । सध । स्थेषु । महः । दिवः । चारुम् । सुकृत्यया । सु । कृत्यया । ईमहे ॥८३६॥

Samveda - Mantra Number : 836
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(तं त्वा) हे सोम—शान्तस्वरूप परमात्मन्! उस तुझे (नृम्णानि बिभ्रतम्) उपासकनरों के नमाने वाले सुखसाधनों के धारण करते हुए को (महः-दिवः) महान् मोक्षधाम के समानस्थानों—सुखस्थानों में (चारुं सुकृत्यया-ईमहे) चरणशील व्यापने वाले सुन्दर को हम उपासना से चाहते हैं सङ्गति में चाहते हैं।
Essence
महान् मोक्षधाम के समानस्थानों में उपासकजनों को झुकाने वाले धनों के धारण करने वाले उस तुझ व्यापनशील सुन्दर परमात्मा को उपासना से प्राप्त करना चाहते हैं॥१॥
Special
ऋषिः—कविः (क्रान्तदर्शी उपासक)॥ देवता—पवमानः सोमः (आनन्दधारा में प्राप्त होने वाला शान्तस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥