Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 834

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ नः꣢ सोम꣣ स꣢हो꣣ जु꣡वो꣢ रू꣣पं꣡ न वर्च꣢꣯से भर । सु꣣ष्वाणो꣢ दे꣣व꣡वी꣢तये ॥८३४॥

आ꣡ । नः꣣ । सोम । स꣡हः꣢꣯ । जु꣡वः꣢꣯ । रू꣣प꣢म् । न । व꣡र्च꣢꣯से । भ꣣र । सुष्वाणः꣢ । दे꣣व꣡वी꣣तये । दे꣣व꣡ । वी꣣तये ॥८३४॥

Mantra without Swara
आ नः सोम सहो जुवो रूपं न वर्चसे भर । सुष्वाणो देववीतये ॥

आ । नः । सोम । सहः । जुवः । रूपम् । न । वर्चसे । भर । सुष्वाणः । देववीतये । देव । वीतये ॥८३४॥

Samveda - Mantra Number : 834
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (सुष्वाणः) उपासना द्वारा साक्षात् हुआ (नः) हमारी (जुवः सहः-रूपं न) वाणी के “जूरसीत्येतद्ध वा अस्या वाच एकं नाम” [श॰ ३.२.४.११] बल “सहः-बलनाम” [निघं॰ २.९] को निरूपणप्रकार भावनामय को भी (वर्चसे) आत्मतेज के सम्पन्न करने के लिए (देववीतये) तुझ देव की प्राप्ति के लिए (आभर) आभरित कर—पूर्णरूप से भर दे।
Essence
परमात्मा उपासकों को स्वसाक्षात्कार के निमित्त उनकी वाणी में वदनशक्ति और भावमय स्तवनप्रकार को आत्मतेज के लिए और अपनी प्राप्ति के लिए पूरा भर देता है॥२॥
Special