Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 833

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣡जा꣢ मे꣣धा꣡भि꣢रीयते꣣ प꣡व꣢मानो म꣣ना꣡वधि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण꣣ या꣡त꣢वे ॥८३३॥

रा꣡जा꣢꣯ । मे꣣धा꣡भिः꣢ । ई꣣यते । प꣡व꣢꣯मानः । म꣡नौ꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण । या꣡त꣢꣯वे ॥८३३॥

Mantra without Swara
राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि । अन्तरिक्षेण यातवे ॥

राजा । मेधाभिः । ईयते । पवमानः । मनौ । अधि । अन्तरिक्षेण । यातवे ॥८३३॥

Samveda - Mantra Number : 833
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पवमानः-राजा) आनन्दधारा में प्राप्त होने वाला सर्वत्र राजमान—विराजमान तथा दीप्यमान प्रकाशमान परमात्मा (मनौ-अधि) मननशील उपासक में (मेधाभिः) मेधा—बुद्धि—विविध बुद्धियों—विविध मननक्रियाओं के द्वारा “मेधा मतौ धीयते” [निरु॰ ३.१९] मति में रहने वाली मननप्रक्रियाओं से (अन्तरिक्षेण यातवे) हृदयाकाश में प्राप्त होने को (ईयते) धारा जाता है माना जाता है।
Essence
आनन्दधारारूप में प्राप्त होने वाला प्रकाशमान परमात्मा हृदयाकाश में सिद्ध प्राप्त होने को मननशील उपासक में मननक्रियाओं से माना—जाना जाता है॥१॥
Special
ऋषिः—जमदग्निः (प्रज्वलित ज्ञानाग्नि वाला उपासक)॥