Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 826

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मो꣢꣫ षु ब्र꣣ह्मे꣡व꣢ तदिन्द्र꣣यु꣡र्भुवो꣢꣯ वाजानां पते । म꣡त्स्वा꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तः ॥८२६॥

मा । उ꣣ । सु꣢ । ब्र꣣ह्मा꣢ । इ꣣व । तन्द्रयुः꣢ । भु꣡वः꣢꣯ । वा꣣जानाम् । पते । म꣡त्स्व꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । गो꣡म꣢꣯तः ॥८२६॥

Mantra without Swara
मो षु ब्रह्मेव तदिन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते । मत्स्वा सुतस्य गोमतः ॥

मा । उ । सु । ब्रह्मा । इव । तन्द्रयुः । भुवः । वाजानाम् । पते । मत्स्व । सुतस्य । गोमतः ॥८२६॥

Samveda - Mantra Number : 826
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वाजानां पते) हे अमृत अन्नभोगों के स्वामिन्! तू (ब्रह्मा-इव) ‘ब्रह्मणे’ ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण के लिए अपने उपासक के लिए जैसे ‘ब्रह्मणे-अत्र चतुर्थीविभक्तेर्लुक्’ तू (तन्द्रयुः) तन्द्रा प्राप्त उपेक्षायुक्त (सु-मा-उ भुवः) सुनिश्चित नहीं कभी होता है अतः (गोमतः सुतस्य मत्स्व) स्तुति वाले निष्पादित उपासनारस के उपहार को पाकर प्रसन्न हो।
Essence
हे अमृतभोगों के स्वामिन् परमात्मन्! तू ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण के लिए जैसे अमृतभोग देने में कभी भी निश्चय तन्द्रायुक्त—उपेक्षाकारी नहीं होता ऐसे ही नम्र वाणियों से उपासनारस को स्वीकार करने में भी उपेक्षाकारी नहीं होता है॥३॥
Special