Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 82

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
य꣡दि꣢ वी꣣रो꣢꣫ अनु꣣ ष्या꣢द꣣ग्नि꣡मि꣢न्धीत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । आ꣣जु꣡ह्व꣢द्ध꣣व्य꣡मा꣢नु꣣ष꣡क्शर्म꣢꣯ भक्षीत꣣ दै꣡व्य꣢म् ॥८२

य꣡दि꣢꣯ । वी꣣रः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । स्यात् । अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धीत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । आ꣣जु꣡ह्व꣢त् । आ꣣ । जु꣡ह्व꣢꣯त् । ह꣣व्य꣢म् । आ꣣नुष꣢क् । अ꣣नु । स꣢क् । श꣡र्म꣢꣯ । भ꣣क्षीत । दै꣡व्य꣢꣯म् ॥८२॥१

Mantra without Swara
यदि वीरो अनु ष्यादग्निमिन्धीत मर्त्यः । आजुह्वद्धव्यमानुषक्शर्म भक्षीत दैव्यम् ॥८२

यदि । वीरः । अनु । स्यात् । अग्निम् । इन्धीत । मर्त्यः । आजुह्वत् । आ । जुह्वत् । हव्यम् । आनुषक् । अनु । सक् । शर्म । भक्षीत । दैव्यम् ॥८२॥१

Samveda - Mantra Number : 82
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यदि ‘यत्-इ’) जब हि—जब कि (मर्त्यः) मनुष्य (अग्निम्-इन्धीत) परमात्मा को अपने आत्मा में प्रदीप्त करे—उपासना में लावे—ध्यावे (अनु) फिर (वीरः-स्यात्) वह वीर हो जावे स्वात्मबल का बलवान् हो जावे—वास्तविक स्वाश्रय वीर बन जावे “स ह वाव वीरो य आत्मन एव वीर्यमनु वीरः” [जै॰ २.२८२] (आनुषक्-हव्यम्-आजुह्वत्) पुनः आनुपूर्व्य—क्रमशः—निरन्तर “आनुषगिति नामानुपूर्व्यस्यानुषक्तं भवति” [निरु॰ ६.१५] उस परमात्मा अग्नि में अपने आत्मभाव हवि को समन्तरूप से समर्पित करता है, तो (दैव्यं शर्म भक्षीत) देवों—मुक्तों वाले सुख—मोक्षानन्द को “शर्म सुखनाम” [निरु॰ ३.६] भोगता है।
Essence
धनबल या शरीरबल या सत्ताबल या जनबल के आधार पर बलवान् नहीं होता किन्तु परमात्मा की शरण में जाने से, उसके आराधन से, उस पर आस्था रखने से बलवान् बनता है पुनः निरन्तर परमात्मा के प्रति अपना समर्पण रखने से मोक्षानन्द को भी भोगता है॥२॥
Special
ऋषिः—वामदेवो वा भरद्वाजो वा (वननीय परमात्मदेव वाला या अमृत अन्न भोग को धारण करने वाला उपासक)॥