Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 816

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ज꣡घ्नि꣢र्वृ꣣त्र꣡म꣢मि꣣त्रि꣢य꣣ꣳ स꣢स्नि꣣र्वा꣡जं꣢ दि꣣वे꣡दि꣢वे । गो꣡षा꣢तिरश्व꣣सा꣡ अ꣢सि ॥८१६॥

ज꣡घ्निः꣢꣯ । वृ꣣त्र꣢म् । अ꣣मित्रि꣡य꣢म् । अ꣣ । मित्रि꣡य꣢म् । स꣡स्निः꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯म् । दि꣣वे꣡दि꣢वे । दि꣣वे꣡ । दि꣣वे । गो꣡षा꣢꣯तिः । गो । सा꣣तिः । अश्वसाः꣢ । अ꣣श्व । साः꣢ । अ꣣सि ॥८१६॥

Mantra without Swara
जघ्निर्वृत्रममित्रियꣳ सस्निर्वाजं दिवेदिवे । गोषातिरश्वसा असि ॥

जघ्निः । वृत्रम् । अमित्रियम् । अ । मित्रियम् । सस्निः । वाजम् । दिवेदिवे । दिवे । दिवे । गोषातिः । गो । सातिः । अश्वसाः । अश्व । साः । असि ॥८१६॥

Samveda - Mantra Number : 816
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अमित्रियं वृत्रं जघ्निः) अमित्र न मित्र—शत्रु के समान आचरण करते हुए पाप को नष्ट करता है (दिवे दिवे वाजं सस्निः) दिन दिन प्रतिदिन अध्यात्मबल का दाता है (गोषातिः-अश्वसाः-असि) वाणी—स्तुति को सेवन—स्वीकार करने वाला आशुव्यापी मन—मनोभाव का सेवन करने—स्वीकार करने वाला है।
Essence
शत्रु के समान आचरण करने वाले पाप को परमात्मन् तू नष्ट करता है। आध्यात्मिक बल को प्रदान करता है। पश्चात् हमारी स्तुतियाँ स्वीकार करता है और मनोभाव को भी अपनाता है॥२॥
Special