Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 807

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उपमन्युर्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
र꣣सा꣢य्यः꣣ प꣡य꣢सा꣣ पि꣡न्व꣢मान ई꣣र꣡य꣢न्नेषि꣣ म꣡धु꣢मन्तम꣣ꣳशु꣢म् । प꣡व꣢मान सन्त꣣नि꣡मे꣢षि कृ꣣ण्व꣡न्निन्द्रा꣢꣯य सोम परिषि꣣च्य꣡मा꣢नः ॥८०७॥

र꣣सा꣡स्यः꣢ । प꣡य꣢꣯सा । पि꣡न्व꣢꣯मानः । ई꣣र꣡य꣢न् । ए꣣षि । म꣡धु꣢꣯मन्तम् । अ꣣ꣳशु꣢म् । प꣡व꣢꣯मान । स꣣न्तनि꣢म् । स꣣म् । त꣢निम् । ए꣣षि । कृण्व꣢न् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । परिषिच्य꣡मा꣢नः । प꣣रि । सिच्य꣡मा꣢नः ॥८०७॥

Mantra without Swara
रसाय्यः पयसा पिन्वमान ईरयन्नेषि मधुमन्तमꣳशुम् । पवमान सन्तनिमेषि कृण्वन्निन्द्राय सोम परिषिच्यमानः ॥

रसास्यः । पयसा । पिन्वमानः । ईरयन् । एषि । मधुमन्तम् । अꣳशुम् । पवमान । सन्तनिम् । सम् । तनिम् । एषि । कृण्वन् । इन्द्राय । सोम । परिषिच्यमानः । परि । सिच्यमानः ॥८०७॥

Samveda - Mantra Number : 807
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पवमान सोम) हे आनन्दधारा में प्राप्त होते हुए शान्तस्वरूप परमात्मन्! (रसाय्यः) उपासनारस योग्य (पयसा) उपासनारस के द्वारा “रसो वै पयः” [श॰ ४.४.४.८] (पिन्वमानः) सेवन किया जाता हुआ “पिवि सेवने” [भ्वादि॰] (मधुमन्तम्-अंशुम्-ईरयन्-एषि) कामभाव वाले कामना वाले मन को “सर्वे वै कामा मधु” [ऐ॰ आ॰ १.१.३] “मनो ह वाऽअंशुः” [श॰ ११.५.९.२] उत्कृष्ट करता हुआ उपासक को प्राप्त होता है तथा (परिषिच्यमानः) उपासनारस से परितृप्त किया जाता हुआ (इन्द्राय) उपासक आत्मा के लिए (सन्तनिं कृण्वन्-एषि) प्राण—प्राणशक्ति को जीवन को भी सुसम्पन्न करता हुआ आता है।
Essence
आनन्दधारा में आने वाला शान्तस्वरूप परमात्मा उपासनारस प्राप्त करने योग्य पात्र उपासनारस के द्वारा सेवन किया जाता हुआ कामना विषय वाले मन को उत्कृष्ट करता हुआ उपासक को प्राप्त होता है तथा उपासनारस से तृप्त हुआ प्रसन्न हुआ परमात्मा उपासक आत्मा के लिये प्राणशक्ति जीवन को भी सुसम्पन्न बनाता हुआ प्राप्त होता है॥२॥
Special