Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 806

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उपमन्युर्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वृ꣢षा꣣ शो꣡णो꣢ अभि꣣क꣡नि꣢क्रद꣣द्गा꣢ न꣣द꣡य꣢न्नेषि पृथि꣣वी꣢मु꣣त꣢ द्याम् । इ꣡न्द्र꣢स्येव व꣣ग्नु꣡रा शृ꣢꣯ण्व आ꣣जौ꣡ प्र꣢चो꣣द꣡य꣢न्नर्षसि꣣ वा꣢च꣣मे꣢माम् ॥८०६॥

वृ꣡षा꣢꣯ । शो꣡णः꣢꣯ । अ꣣भिक꣡नि꣢क्रदत् । अ꣣भि । क꣡नि꣢꣯क्रदत् । गाः । न꣣द꣡य꣢न् । ए꣣षि । पृथिवी꣣म् । उ꣣त꣢ । द्याम् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । इ꣣व । वग्नुः꣢ । आ । शृ꣣ण्वे । आजौ꣢ । प्र꣣चोद꣡य꣢न् । प्र꣣ । चोद꣡य꣢न् । अ꣣र्षसि । वा꣡च꣢꣯म् । आ । इ꣣मा꣢म् ॥८०६॥

Mantra without Swara
वृषा शोणो अभिकनिक्रदद्गा नदयन्नेषि पृथिवीमुत द्याम् । इन्द्रस्येव वग्नुरा शृण्व आजौ प्रचोदयन्नर्षसि वाचमेमाम् ॥

वृषा । शोणः । अभिकनिक्रदत् । अभि । कनिक्रदत् । गाः । नदयन् । एषि । पृथिवीम् । उत । द्याम् । इन्द्रस्य । इव । वग्नुः । आ । शृण्वे । आजौ । प्रचोदयन् । प्र । चोदयन् । अर्षसि । वाचम् । आ । इमाम् ॥८०६॥

Samveda - Mantra Number : 806
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(गाः-अभिक्रन्दत्) उपासक आत्मा जब आरम्भ सृष्टि में परमात्मन्! तेरी स्तुतियाँ करता है, तब हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (वृषा शोणः) सुखवर्षक—कामनापूरक स्वज्ञान से प्रकाशमान हुआ (पृथिवीम्-उत द्यां नदयन्-एषि) ज्ञान का प्रवचन करता हुआ प्राण और उदान को हृदय को प्राप्त होता है “इमे हि द्यावापृथिवी प्राणोदानौ” [श॰ ४.३.१.२२] तब (इन्द्रस्य वग्नुः-इव) विद्युत् के स्तयित्नु मेघ में शब्द की भाँति (आशृण्वे) वह उपासक सुनता है ‘पुरुषव्यत्ययः,’ हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू जिस (इमां वाचम्-आजौ प्रचोदयन्-आ-अर्षसि) इस वाणी—कल्याणी वाणी—वेद को प्रेरित प्रकाशित करने के हेतु जीवन संग्राम स्थल संसार या आजवन या महत्त्वपूर्ण हृदयस्थान में समन्तरूप से प्राप्त होता है “परमं वा एतन्महो यदाजिः” [जै॰ २.४०५]।
Essence
आरम्भसृष्टि के उपासक जब परमात्मा की स्तुतियाँ करते हैं तो शान्तस्वरूप परमात्मा सुखवर्षक स्वज्ञानप्रकाशस्वरूप बन उस के प्राण और उदान को उनसे पूरित हृदय देश को प्रत्येक श्वास प्रश्वास के साथ आता है, प्रवचन करता है। उसे उपासक सुनते हैं। इस कल्याणी वाणी वेद को प्रेरित करने के हेतु तू समन्तरूप जीवनसंग्रामस्थल संसार में या आजवन या महत्त्वपूर्ण हृदयस्थान में समन्तरूप से प्राप्त होता है॥१॥
Special
ऋषिः—उपमन्युः (परमात्मा का उपमनन करने वाला उपासना करने वाला)॥ देवता—पवमानः सोमः (आनन्दधारा में आता हुआ शान्त परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥