Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 794

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ते꣢न꣣ या꣡वृ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢वृ꣣त꣢स्य꣣ ज्यो꣡ति꣢ष꣣स्प꣡ती꣢ । ता꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा हुवे ॥७९४॥

ऋते꣡न꣢ । यौ । ऋ꣣तावृ꣡धौ꣢ । ऋ꣣त । वृ꣡धौ꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ज्यो꣡ति꣢꣯षः । पती꣢꣯इ꣡ति꣢ । ता । मि꣡त्रा꣢ । मि꣡ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । हु꣣वे ॥७९४॥

Mantra without Swara
ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती । ता मित्रावरुणा हुवे ॥

ऋतेन । यौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्य । ज्योतिषः । पतीइति । ता । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । हुवे ॥७९४॥

Samveda - Mantra Number : 794
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यौ) जो (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण परमात्मा (तौ) वे (ऋतेन) यथार्थ ज्ञान से वर्तमान हैं (ऋतावृधौ) यथार्थ ज्ञान के वर्धक हैं (ऋतस्य ज्योतिषः) यथार्थ ज्ञानज्योति के (पती) पालक हैं—पालन करने वाले हैं (ता) उन्हें (हुवे) मैं आमन्त्रित करता हूँ।
Essence
संसार में कर्मकरणार्थ प्रेरक और मोक्ष कर्मफलभोगार्थ अङ्गीकारकर्ता परमात्मा यथार्थ ज्ञान से वर्तमान है, यथार्थ ज्ञान का वर्धक है। यथार्थ ज्ञान ज्योति के पालन कराने वाला है, उससे जीवन धारण करना चाहिये॥२॥
Special