Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 791

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡म꣢ग्नि꣣ꣳ ह꣡वी꣢मभिः꣣ स꣡दा꣢ हवन्त वि꣣श्प꣡ति꣢म् । ह꣣व्यवा꣡हं꣢ पुरुप्रि꣣य꣢म् ॥७९१॥

अ꣣ग्नि꣡म꣢ग्निम् । अ꣣ग्नि꣢म् । अ꣣ग्निम् । ह꣡वी꣢꣯मभिः । स꣡दा꣢꣯ । ह꣣वन्त । विश्प꣡ति꣢म् । ह꣣व्यवा꣡ह꣢म् । ह꣣व्य । वा꣡ह꣢꣯म् । पु꣣रुप्रिय꣢म् । पु꣣रु । प्रिय꣢म् ॥७९१॥

Mantra without Swara
अग्निमग्निꣳ हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम् । हव्यवाहं पुरुप्रियम् ॥

अग्निमग्निम् । अग्निम् । अग्निम् । हवीमभिः । सदा । हवन्त । विश्पतिम् । हव्यवाहम् । हव्य । वाहम् । पुरुप्रियम् । पुरु । प्रियम् ॥७९१॥

Samveda - Mantra Number : 791
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(हवीमभिः) आह्वानसाधन मन्त्रों से (पुरुप्रियम्) बहुतों के प्रिय या बहुत प्रिय (हव्यवाहम्) हाव भाव स्तुतिरूप भेंट को प्राप्त करने वाले—स्वीकार करने वाले (विश्पतिम्) ज्येष्ठ “ज्येष्ठो विश्पतिः” [तै॰ सं॰ २.३.३३] (अग्निम्-अग्निम्) ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा हाँ ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा को (सदा) नित्य, अत एव ‘अग्निम्-अग्निम्’ पाठः “नित्यवीप्सयोः” [अष्टा॰ ८.१.४] (हवन्ते) उपासकजन आमन्त्रित करते हैं।
Essence
आह्वानसाधन मन्त्रों मननीय वचनों से बहुत प्रिय स्तुति भेंट को स्वीकार करने वाले ज्येष्ठ—सर्वश्रेष्ठ अग्रणायक ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा को नित्य उपासकजन आहूत करते हैं—आमन्त्रित करते हैं॥२॥
Special