Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 770

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡दी꣢ꣳ ह꣣ꣳसो꣡ यथा꣢꣯ ग꣣णं꣡ विश्व꣢꣯स्यावीवशन्म꣣ति꣢म् । अ꣢त्यो꣣ न꣡ गोभि꣢꣯रज्यते ॥७७०॥

आ꣢त् । ई꣣म् । हꣳसः꣢ । य꣡था꣢꣯ । ग꣣ण꣢म् । वि꣡श्व꣢꣯स्य । अ꣣वीवशत् । मति꣢म् । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । गो꣡भिः꣢꣯ । अ꣣ज्यते ॥७७०॥

Mantra without Swara
आदीꣳ हꣳसो यथा गणं विश्वस्यावीवशन्मतिम् । अत्यो न गोभिरज्यते ॥

आत् । ईम् । हꣳसः । यथा । गणम् । विश्वस्य । अवीवशत् । मतिम् । अत्यः । न । गोभिः । अज्यते ॥७७०॥

Samveda - Mantra Number : 770
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(आत्-ईम्) तो फिर (यथा हंसः-गणम्-अवीवशत्) जैसे हंस अन्य पक्षीगण को अपने श्वेत सुन्दरता आदि गुणों से वश करता है अपेक्षा से प्रशंसापत्र बनता है (विश्वस्य मतिम्) ऐसे यह सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा अपने न्याय दया आनन्द आदि गुणों में संसारभर के मतिमान् जन को ‘अत्र मतुप्प्रत्ययस्य लुक् छान्दसः’ वश करता है स्वप्रभाव में ले आता है तथा (अत्यः-न गोभिः-अज्यते) जैसे अतनशील घोड़ा अन्नाद्यों—दाने चारे आदि से व्यक्त—पुष्ट प्रसन्न किया जाता है ऐसे सोम—परमात्मा भी स्तुतियों से हृदय में साक्षात् किया जाता है ‘उपमेयलुप्तोपमालङ्कारः’।
Essence
हंस जैसे पक्षीगण को अपने गुणों से अभिभूत करता है, मोहित करता है, ऐसे परमात्मा संसार के मतिमान् मात्र को प्रभावित करता है तथा गतिशील घोड़ा जैसे दाने चारे जल से प्रसन्न पुष्ट किया जाता है, ऐसे परमात्मा स्तुतियों से हृदय में साक्षात् किया जाता है॥२॥
Special