Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 766

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सु꣣ता꣡ इन्द्रा꣢꣯य वा꣣य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣣ । सो꣡मा꣢ अर्षन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे ॥७६६॥

सु꣣ताः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वा꣣य꣡वे꣢ । व꣡रु꣢꣯णाय । म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । सो꣡माः꣢꣯ । अ꣣र्षन्तु । वि꣡ष्ण꣢꣯वे ॥७६६॥

Mantra without Swara
सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः । सोमा अर्षन्तु विष्णवे ॥

सुताः । इन्द्राय । वायवे । वरुणाय । मरुद्भ्यः । सोमाः । अर्षन्तु । विष्णवे ॥७६६॥

Samveda - Mantra Number : 766
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सुताः सोमाः) उपासित शान्त परमात्मा (इन्द्राय) वाणी के लिए “अथ य इन्द्रः सा वाक्” [जै॰ १.११] (वायवे) मन के लिए “मनो वायुः” [काठ॰ १.१] (वरुणाय) प्राण के लिए “यः प्राणः स वरुणः” [गो॰ २.४.११] (मरुद्भ्यः) ओज—आत्मतेज के लिए “ओजो वै वीर्यं मरुतः” [जै॰ ३.३०९] (विष्णवे) वीर्य के लिए “वीर्यं विष्णुः” [तै॰ १.७.२.२३] (अर्षन्तु) प्राप्त हों।
Essence
उपासित शान्तस्वरूप परमात्मा उपासक के वाक्—वाणी, मन, प्राण, ओज—आत्मतेज, वीर्य—शारीरिक बल को प्राप्त हो इन्हें यथोचित उन्नत करे॥३॥
Special