Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 760

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दु꣣हानः꣢ प्र꣣त्न꣡मित्पयः꣢꣯ प꣣वि꣢त्रे꣣ प꣡रि꣢ षिच्यसे । क्र꣡न्दं꣢ दे꣣वा꣡ꣳ अ꣢जीजनः ॥७६०॥

दुहानः꣢ । प्र꣡त्न꣢म् । इत् । प꣡यः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣च्यसे । क्र꣡न्द꣢꣯न । दे꣣वा꣢न् । अ꣣जीजनः ॥७६०॥

Mantra without Swara
दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यसे । क्रन्दं देवाꣳ अजीजनः ॥

दुहानः । प्रत्नम् । इत् । पयः । पवित्रे । परि । सिच्यसे । क्रन्दन । देवान् । अजीजनः ॥७६०॥

Samveda - Mantra Number : 760
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(दुहानः) ‘दुह्यमानः’ कर्मणि कर्तृप्रत्ययः, वेदज्ञान से दुह्यमान—दुहा जाता हुआ हे सोम—शान्त परमात्मन्! (प्रत्नम्-इत् पयः) शाश्वत दूधरूप ही (पवित्रे परिषिच्यसे) पवित्र—हृदय में परिषिक्त किया जाता है—बिठाया जाता है (क्रन्दन् देवान्-अजीजनः) तू उपदेश देता हुआ मेरे अन्दर दिव्यगुणों को उत्पन्न करता है।
Essence
शान्तस्वरूप परमात्मा वेदज्ञान से प्राप्त किया हुआ शाश्वत दूधरूप हृदय में निश्चित बैठ जाता है, वहाँ उपदेश करता हुआ दिव्यगुणों को प्रकट करता है॥३॥
Special