Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 745

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ घा꣢ गम꣣द्य꣢दि꣣ श्र꣡व꣢त्सह꣣स्रि꣡णी꣢भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । वा꣡जे꣢भि꣣रु꣡प꣢ नो꣣ ह꣡व꣢म् ॥७४५॥

आ । घ꣣ । गमत् । य꣡दि꣢꣯ । श्र꣡व꣢꣯त् । स꣣हस्री꣡णी꣢भिः । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ । वा꣡जे꣢꣯भिः । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡वम्꣢꣯ ॥७४५॥

Mantra without Swara
आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः । वाजेभिरुप नो हवम् ॥

आ । घ । गमत् । यदि । श्रवत् । सहस्रीणीभिः । ऊतिभिः । वाजेभिः । उप । नः । हवम् ॥७४५॥

Samveda - Mantra Number : 745
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नः-हवं यदि श्रवत्) हमारे नम्र स्तुतिवचन या आमन्त्रण को वह इन्द्र—परमात्मा यदि सुने—स्वीकार करे तो (घ) निश्चय—अवश्य (सहस्रिणीभिः-ऊतिभिः) आयुष्मती—दीर्घ जीवन देनेवाली रक्षा पद्धतियों के साथ “आयुर्वें सहस्रम्” [तै॰ १.८.१५] (आगमत्) आ जावे तथा (वाजेभिः-उप) अमृत अन्न भोगों के द्वारा उपकृत करे।
Essence
उपासक नम्र स्तुतिवचन या आमन्त्रण परमात्मा के प्रति करे तो परमात्मा उसे अवश्य सुन—स्वीकार कर दीर्घ जीवन देने वाली रक्षा विधियों के साथ उसके हृदय में प्राप्त होता है साक्षात् होता है तथा उस उपासक को अमृत भोगों से भी उपकृत कर देता है॥३॥
Special