Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 744

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡नु꣢ प्र꣣त्न꣡स्यौक꣢꣯सो हु꣣वे꣡ तु꣢विप्र꣣तिं꣡ नर꣢꣯म् । यं꣢ ते꣣ पू꣡र्वं꣢ पि꣣ता꣢ हु꣣वे꣢ ॥७४४॥

अ꣣नु꣢꣯ । प्र꣣त्न꣡स्य꣢ । ओ꣡क꣢꣯सः । हु꣣वे꣢ । तु꣣विप्रति꣢म् । तु꣣वि । प्रति꣢म् । न꣡र꣢꣯म् । यम् । ते꣣ । पू꣡र्व꣢꣯म् । पि꣣ता꣢ । हु꣣वे꣢ ॥७४४॥

Mantra without Swara
अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम् । यं ते पूर्वं पिता हुवे ॥

अनु । प्रत्नस्य । ओकसः । हुवे । तुविप्रतिम् । तुवि । प्रतिम् । नरम् । यम् । ते । पूर्वम् । पिता । हुवे ॥७४४॥

Samveda - Mantra Number : 744
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(प्रत्नस्य-ओकसः) दिव् स्थान “असौ वै द्युलोकः प्रत्नम्” [मै॰ १.५.५] “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ॰ १०.९०.३] मोक्ष स्थान के (अनु) ऊपर वर्तमान (तुविप्रतिम्) बहुतों के प्रतिपालक—बहुतेरे मुक्तात्माओं को स्वानन्द से पूरण करनेवाले—(नरम्) नेता—स्वामी परमात्मा को (हुवे) मैं आमन्त्रित करता हूँ (यं ते पूर्वं पिता हुवे) जिस “ते-त्वाम् विभक्तिव्यत्ययः” तुझ परमात्मा को पहले भी मेरा पिता आमन्त्रित करता रहा।
Essence
मोक्षधाम पर शासक परमात्मा जोकि बहुतेरे मुक्तात्माओं को स्वानन्द से पूरण करनेवाला है उस नेता को उपासक अपने हृदय में आमन्त्रित करें और परम्परा से अपने पूर्वज ब्रह्मा आदि भी आमन्त्रित करते रहे हैं। परम्परा का आदर्श आचरण अथवा हेतु ग्राह्य है “स पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत” [ऋ॰ १.१.२]॥२॥
Special