Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 739

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ ते꣢ अश्नोतु कु꣣क्ष्योः꣢꣫ प्रेन्द्र꣣ ब्र꣡ह्म꣢णा꣣ शि꣡रः꣢ । प्र꣢ बा꣣हू꣡ शू꣢र꣣ रा꣡ध꣢सा ॥७३९॥

प्र꣢ । ते꣣ । अश्नोतु । कुक्ष्योः꣢ । प्र । इ꣣न्द्र । ब्र꣡ह्म꣢꣯णा । शि꣡रः꣢꣯ । प्र । बा꣣हू꣡इति꣢ । शू꣣र । रा꣡ध꣢꣯सा ॥७३९॥

Mantra without Swara
प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः । प्र बाहू शूर राधसा ॥

प्र । ते । अश्नोतु । कुक्ष्योः । प्र । इन्द्र । ब्रह्मणा । शिरः । प्र । बाहूइति । शूर । राधसा ॥७३९॥

Samveda - Mantra Number : 739
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! उपासक (ते कुक्ष्योः-अश्नोतु) तेरे दोनों पार्श्वों में वर्तमान अभ्युदय और निःश्रेयस को—संसार सुख और मोक्षानन्द को प्राप्त करे—करता है (ब्रह्मणा शिरः प्र) तेरे वेदज्ञान से अपने मस्तिष्क को प्रवृद्ध करता है (शूर) हे महाबलवन् परमात्मन्! (राधसा बाहू प्र) संसिद्धि—संयमरूप आराधना से शरीरात्मबलों को प्राप्त करता है “बाहुर्वीर्यः” [तां॰ ६.१.८]।
Essence
परमात्मा से उपासक मोक्षानन्द और संसारसुख तो प्राप्त करता ही है परन्तु साथ ही उसके ज्ञान से मस्तिष्क को विकसित करता और संयमपूर्वक आराधना से आत्मबल और जीवनबल को भी प्राप्त किया करता है॥३॥
Special