Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 735

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नृ꣡भि꣢र्धौ꣣तः꣢ सु꣣तो꣢꣫ अश्नै꣣र꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢पूतः । अ꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥

नृ꣡भिः꣢꣯ । धौ꣣तः꣢ । सु꣣तः꣢ । अ꣡श्नैः꣢꣯ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रैः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯पूतः । प꣡रि꣢꣯ । पू꣣तः । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । नि꣣क्तः꣢ । न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥

Mantra without Swara
नृभिर्धौतः सुतो अश्नैरव्या वारैः परिपूतः । अश्वो न निक्तो नदीषु ॥

नृभिः । धौतः । सुतः । अश्नैः । अव्याः । वारैः । परिपूतः । परि । पूतः । अश्वः । न । निक्तः । नदीषु ॥७३५॥

Samveda - Mantra Number : 735
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नृभिः) मुमुक्षुजनों द्वारा “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] (सुतः) निष्पादित (धौतः) प्राप्त (अव्याः-अश्नैः-वारैः) योगभूमि—योगस्थली के “इयं पृथिवी वा-अविः” [श॰ ६.१.२.३३] दोषवारणसाधनों—अभ्यासों से (परिपूतः) सब ओर से परमात्मा रक्षित होता है (अश्वः-नदीभिः-निक्तः) जैसे खुली जलधाराओं से घोड़ा कान्त बनाया जाता है ऐसे।
Essence
मुमुक्षुजन परमात्मा को अपने अन्दर श्रद्धा भरे योगभूमिस्थ अभ्यासों द्वारा निर्मल साक्षात् करते हैं जैसे जलधाराओं से घोड़े को स्नान करा निर्मल कान्तरूप में देखते हैं॥२॥
Special