Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 733

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣ह꣢ त्वा꣣ गो꣡प꣢रीणसं म꣣हे꣡ म꣢न्दन्तु꣣ रा꣡ध꣢से । स꣡रो꣢ गौ꣣रो꣡ यथा꣢꣯ पिब ॥७३३॥

इह꣢ । त्वा꣣ । गो꣡प꣢꣯रीणसम् । गो । प꣣रीणसम् । महे꣣ । म꣣न्दन्तु । रा꣡ध꣢꣯से । स꣡रः꣢꣯ । गौ꣣रः꣢ । य꣡था꣢꣯ । पि꣢ब ॥७३३॥

Mantra without Swara
इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्तु राधसे । सरो गौरो यथा पिब ॥

इह । त्वा । गोपरीणसम् । गो । परीणसम् । महे । मन्दन्तु । राधसे । सरः । गौरः । यथा । पिब ॥७३३॥

Samveda - Mantra Number : 733
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(त्वा गोपरीणसम्) हे परमात्मन्! तुझ स्तुति-वाणियों से प्राप्त होने वाले अध्यात्म अन्न को “अन्नं वै परीणसम्” [जै॰ ३.१७४] (महे राधसे) महान् मोक्षैश्वर्य की प्राप्ति के लिए (मन्दन्तु) उपासकजन स्तुत करें—अर्चित करें “मदतिः-अर्चति कर्मा” [निघं॰ ३.१४] (गौरः-यथा सरः पिब) गौर हरिण जैसे सर—उदक जल तृप्ति से पीता है ऐसे उपासक के उपासनारस का पान कर।
Essence
स्तुतियों से प्राप्त होने योग्य मोक्ष भोग वाले तुझ परमात्मा की मोक्षैश्वर्य के लिए उपासक अर्चना करते हैं, तू उनके अर्चना रूप आर्द्ररस को पूर्णरूप से पान कर॥३॥
Special