Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 732

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा꣡ त्वा꣢ मू꣣रा꣡ अ꣢वि꣣ष्य꣢वो꣣ मो꣢प꣣ह꣡स्वा꣢न꣣ आ꣡ द꣢भन् । मा꣡ कीं꣢ ब्रह्म꣣द्वि꣡षं꣢ वनः ॥७३२॥

मा । त्वा꣣ । मूराः꣢ । अ꣣विष्य꣡वः꣢ । मा । उ꣣प꣡ह꣢स्वानः । उप । ह꣡स्वा꣢꣯नः । आ । द꣣भन् । मा꣢ । की꣣म् । ब्रह्मद्वि꣡ष꣢म् । ब्र꣣ह्म । द्वि꣡ष꣢꣯म् । व꣣नः ॥७३२॥

Mantra without Swara
मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन् । मा कीं ब्रह्मद्विषं वनः ॥

मा । त्वा । मूराः । अविष्यवः । मा । उपहस्वानः । उप । हस्वानः । आ । दभन् । मा । कीम् । ब्रह्मद्विषम् । ब्रह्म । द्विषम् । वनः ॥७३२॥

Samveda - Mantra Number : 732
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (त्वा) तुझे (मूराः) मूढ लोग “मूराः-मूढाः” [निरु॰ ६.८] (अविष्यवः) भोग की कामना करने वाले (मा-आदभन्) नहीं दबा सकते, और (उपहस्वानः-मा) न उपहास करने को नास्तिकजन तुझे दबा सकते हैं (ब्रह्मद्विषम्) तेरे प्रति द्वेष करने वाले ऐसे भोगी और नास्तिक को (माकीं वनः) न कभी तू सम्भजन करता है उसका पक्ष करता है अपनाता है।
Essence
भोग-विलासी तथा नास्तिक मूढजन परमात्मा के दण्ड से बच नहीं सकते। ऐसे ब्रह्मद्वेषी ईश्वरीय नियम और उपकार के द्वेषीजन को परमात्मा कभी अपनाता नहीं है॥२॥
Special