Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 720

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ घे꣢म꣣न्य꣡दा प꣢꣯पन꣣ व꣡ज्रि꣢न्न꣣प꣢सो꣣ न꣡वि꣢ष्टौ । त꣢꣯वेदु꣣ स्तो꣡मै꣢श्चिकेत ॥७२०॥

न꣢ । घ꣣ । ईम् । अन्य꣢त् । अ꣣न् । य꣢त् । आ । प꣣पन । व꣡ज्रि꣢꣯न् । अ꣣प꣡सः꣢ । न꣡वि꣢꣯ष्टौ । त꣡व꣢꣯ । इत् । उ꣣ । स्तो꣡मैः꣢꣯ । चि꣣केत ॥७२०॥

Mantra without Swara
न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ । तवेदु स्तोमैश्चिकेत ॥

न । घ । ईम् । अन्यत् । अन् । यत् । आ । पपन । वज्रिन् । अपसः । नविष्टौ । तव । इत् । उ । स्तोमैः । चिकेत ॥७२०॥

Samveda - Mantra Number : 720
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वज्रिन्) हे ओजस्वी तेजस्वी परमात्मन्! “वज्रो वा ओजः” [श॰ ८.४.१.२०] (अपसः) तुझ व्यापक कर्मशक्तिमान् की (नविष्टौ) स्तुतियज्ञ में “णु स्तुतौ” [अदादि॰] (अन्यत्-न घ-ईम्-आपपन) अन्य की स्तुति कभी नहीं करता हूँ (तव-इत्-उ) तुझे ही (स्तोमैः) समस्त स्तुतिवचनों में ‘विभक्तिव्यत्ययः’ (चिकेत) इष्टदेव जानता—मानता हूँ।
Essence
परमात्मा के स्तुतियाग में किसी अन्य की स्तुति नहीं करनी चाहिये, परमात्मा के स्थान पर न कोई जड़ और न चेतन स्तुति योग्य है किन्तु समस्त स्तुति प्रसङ्गों में परमात्मा को ही इष्टदेव मानना चाहिये॥२॥
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