Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 717

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श꣢꣫ꣳसेदु꣣क्थ꣢ꣳ सु꣣दा꣡न꣢व उ꣣त꣢ द्यु꣣क्षं꣢꣫ यथा꣣ न꣡रः꣢ । च꣣कृमा꣢ स꣣त्य꣡रा꣢धसे ॥७१७॥

श꣡ꣳस꣢꣯ । इत् । उ꣣क्थ꣢म् । सु꣣दा꣡न꣢वे । सु꣣ । दा꣡न꣢वे । उ꣡त꣢ । द्यु꣣क्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । य꣡था꣢꣯ । न꣡रः꣢꣯ । च꣣कृम꣢ । स꣣त्य꣡रा꣢धसे । स꣣त्य꣢ । रा꣣धसे ॥७१७॥

Mantra without Swara
शꣳसेदुक्थꣳ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः । चकृमा सत्यराधसे ॥

शꣳस । इत् । उक्थम् । सुदानवे । सु । दानवे । उत । द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । यथा । नरः । चकृम । सत्यराधसे । सत्य । राधसे ॥७१७॥

Samveda - Mantra Number : 717
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(नरः) मुमुक्षुजन “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] (यथा) जिस प्रकार (सुदानवे) उत्तम दान करने वाले (उत) और (सत्यराधसे) सत्य—स्थायी मोक्षैश्वर्य वाले—अनश्वर धन वाले परमात्मा के लिए (उक्थं शंसेत्) वक्तव्य प्रशंसावचन—स्तवन बोलता है (चकृम) हम भी वैसा ही आचरण करें।
Essence
मुमुक्षुजन जैसे श्रेष्ठ दानदाता स्थिर मोक्षैश्वर्य वाले परमात्मा की स्तुति किया करता है वैसा हम उपासकों को भी करना चाहिये॥२॥
Special