Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 706

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢त्र꣣꣬ क्व꣢꣯ च ते꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्षं꣢ दधस꣣ उ꣡त्त꣢रम् । त꣢त्र꣣ यो꣡निं꣢ कृणवसे ॥७०६॥

य꣡त्र꣢꣯ । क्व꣢ । च꣣ । ते । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । द꣣धसे । उ꣡त्त꣢꣯रम् । त꣡त्र꣢꣯ । यो꣡नि꣢꣯म् । कृ꣣णवसे ॥७०६॥

Mantra without Swara
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् । तत्र योनिं कृणवसे ॥

यत्र । क्व । च । ते । मनः । दक्षम् । दधसे । उत्तरम् । तत्र । योनिम् । कृणवसे ॥७०६॥

Samveda - Mantra Number : 706
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यत्र क्व च) जिस भी उपासक में (ते) तेरे लिए (मनः) मनोभाव—मनन—आस्तिकता है वहाँ तू (उत्तरं दक्षं दधसे) अपना उत्तम वरने योग्य स्वरूप धारण करता है—स्थापित करता है और (तत्र) वहाँ (योनिं कृणवसे) अपना निवास स्थान बनाता है।
Essence
परमात्मन्! जिस उपासक के अन्दर तेरे प्रति मनोभाव आस्तिकता है वहाँ तू अपना दर्शन-ज्ञान कराता है और वहाँ अपना निवास बनाता है॥२॥
Special