Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 704

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऊ꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣ꣳ स꣢ हि꣣ना꣡यम꣢꣯स्म꣣यु꣡र्दाशे꣢꣯म ह꣣व्य꣡दा꣢तये । भु꣢व꣣द्वा꣡जे꣢ष्ववि꣣ता꣡ भुव꣢꣯द्वृ꣣ध꣢ उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥

ऊ꣡र्जः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । सः । हि꣣न꣢ । अ꣣य꣢म् । अ꣣स्म꣢युः । दा꣡शे꣢꣯म । ह꣣व्य꣢꣯दातये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये । भु꣡व꣢꣯त् । वा꣡जे꣢꣯षु । अ꣣वि꣢ता । भु꣡व꣢꣯त् । वृ꣣धे꣢ । उ꣣त꣢ । त्रा꣣ता꣢ । त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥

Mantra without Swara
ऊर्जो नपातꣳ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये । भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम् ॥

ऊर्जः । नपातम् । सः । हिन । अयम् । अस्मयुः । दाशेम । हव्यदातये । हव्य । दातये । भुवत् । वाजेषु । अविता । भुवत् । वृधे । उत । त्राता । तनूनाम् ॥७०४॥

Samveda - Mantra Number : 704
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ऊर्जः-नपातम्) हमारे आत्मस्वरूप को न गिराने वाले अग्नि ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा को “ऊर्ग्वै स्वं यावद्वै पुरुषस्य स्वं भवति” [श॰ ५.३.५.१२] उपासित करें (सः-हिना-अयम्-अस्मयुः) वह सचमुच यह हमें चाहने वाला अपनाने वाला है (हव्यदातये दाशेम) हम अपनी उपासनाहवि को देने के लिए अपने को समर्पित करते हैं (वाजेषु-अविता भुवत्) वह अमृत अन्नभोगों के निमित्त रक्षक है (उत) और (तनूनां वृधे त्राता भुवत्) उपासक आत्माओं के वर्धन—उत्कर्ष के लिए “आत्मा वै तनूः” [श॰ ६.७.२.६] रक्षक होता है।
Essence
हम अपने आत्मस्वरूप को न गिराने वाले अपितु उन्नत करने वाले ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा की उपासना करें। वह भी यथार्थरूप से हमें अपनाने वाला है, अतः उपासनारूप भेंट अर्पित करने के लिए हम अपने को उसकी ओर प्रेरित करें। वह हमारे अमृतभोगों के हेतु रक्षक बनता है और वह सदा उपासक आत्माओं की वृद्धि उन्नति के लिए रक्षक होता है॥२॥
Special