Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 688

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कलिः प्रागाथः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न꣢꣫ यं दु꣣ध्रा꣡ वर꣢꣯न्ते꣣ न꣢ स्थि꣣रा꣢꣫ मुरो꣣ म꣡दे꣢षु शि꣣प्र꣡मन्ध꣢꣯सः । य꣢ आ꣣दृ꣡त्या꣢ शशमा꣣ना꣡य꣢ सुन्व꣣ते꣡ दाता꣢꣯ जरि꣣त्र꣢ उ꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् ॥६८८॥

न । यम् । दु꣣ध्राः꣢ । व꣡र꣢꣯न्ते । न । स्थि꣣राः꣢ । मु꣡रः꣢꣯ । म꣡देषु꣢꣯ । शि꣣प्र꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । यः । आ꣣दृ꣡त्य꣢ । आ꣣ । दृ꣡त्य꣢꣯ । श꣣शमाना꣡य꣢ । सु꣣न्वते꣢ । दा꣡ता꣢꣯ । ज꣣रित्रे꣢ । उ꣣क्थ्य꣢म् ॥६८८॥

Mantra without Swara
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदेषु शिप्रमन्धसः । य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम् ॥

न । यम् । दुध्राः । वरन्ते । न । स्थिराः । मुरः । मदेषु । शिप्रम् । अन्धसः । यः । आदृत्य । आ । दृत्य । शशमानाय । सुन्वते । दाता । जरित्रे । उक्थ्यम् ॥६८८॥

Samveda - Mantra Number : 688
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अन्धसः-मदे) आध्यानीय उपासनीय के आनन्दप्रदान के निमित्त उपासकार्थ (यं सुशिप्रम्-इन्द्रम्) जिस सुगतिमान् विभुगतिमान् परमात्मा को (दुध्राः-न वरन्ते) दुर्धारणा वाले जन नहीं प्राप्त करते हैं (न स्थिराः-मुरः) निष्कर्म ढीठ अविचारशील नहीं प्राप्त करते हैं (यः) जो (शशमानाय सुन्वते जरित्रे) शंसमान—प्रशंसा करते हुए उपासनारस निष्पादन करते हुए स्तोता के लिए (आदृत्य-उक्थ्यं दात) आदर—स्नेह कर के प्रशस्य स्व आनन्द को प्रदान करता है।
Essence
उपासनीय परमात्मा के आनन्दरस प्राप्त करने के लिए उस विभु परमात्मा को दुष्ट विचार वाले ढीठ या विचारशून्य जन प्राप्त नहीं कर सकते हाँ वह परमात्मा प्रशंसा करने वाले उपासनारस निष्पादक स्तोता उपासक के लिए स्नेह स्वागत से अपना प्रशंसनीय आनन्द प्रदान करता है॥२॥
Special