Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 663

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥६६३॥

आ꣢ । नः꣣ । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः꣢ । ग꣡व्यू꣢꣯तिम् । गो । यू꣣तिम् । उक्षतम् । म꣡ध्वा꣢꣯ । र꣡जा꣢꣯ꣳसि । सुक्रतू । सु । क्रतूइ꣡ति꣢ ॥६६३॥

Mantra without Swara
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् । मध्वा रजाꣳसि सुक्रतू ॥

आ । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः । गव्यूतिम् । गो । यूतिम् । उक्षतम् । मध्वा । रजाꣳसि । सुक्रतू । सु । क्रतूइति ॥६६३॥

Samveda - Mantra Number : 663
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सुक्रतू) हे शोभन कर्म वाले—(मित्रावरुणौ) प्राण समान तू संसार में सत्कर्मार्थ प्रेरित करने वाला पुनः अपान के समान मोक्ष में अपनी ओर वरने वाला हुआ “प्राणापनौ मित्रावरुणौ” [तां॰ ६.१०.५]*3 (नः) हमारी (गव्यूतिम्) स्तुतिप्रवहणभूमि—हृदयगुहा को (घृतैः) अपने तेजोमय दर्शन स्नेहादि से (आ-उक्षतम्) सींच दे (मध्वा रजांसि) अपने मीठे सुख भोग फलों से हमारी रञ्जनीय इन्द्रियों को भी सींच—तृप्त कर दे।
Essence
हे सुकर्मा परमात्मन्! तू संसार में सत्कर्मकरणार्थ प्रेरक पुनः मोक्षार्थ अपनी ओर लेने वाला होता हुआ हमारी स्तुति-स्थली को अपने दर्शन स्नेहादि से भर देता है तथा संसार में भी मधुर कर्म-फल भोग से हमारी रञ्जनीय इन्द्रियों को भी तृप्त कर देता है जिनमें पुनः भटकने अशान्त होने का अवसर नहीं रहता॥१॥
Footnote
[*2.“गाथा वाङ्नाम” [निघं॰ १.११]।] [*3.सर्वत्र द्विवचनं परमात्मनो द्विधर्मत्वप्रदर्शनार्थम्।]
Special
ऋषिः—विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा भार्गवः (गाथा वाक् वेदवाक्*2 वेदविद्या में निष्णात सर्वमित्र उपासक या साक्षात् परमात्माग्नि वाला आत्मतेज से पूर्ण उपासक)॥ देवता—मित्रावरुणौ (सत्कर्म में प्रेरक तथा अपनी ओर वरणकर्ता परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥