Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 660

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢ग्न꣣ आ꣡ या꣢हि वी꣣त꣡ये꣢ गृणा꣣नो꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये । नि꣡ होता꣢꣯ सत्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥६६०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । आ । या꣣हि । वीत꣡ये꣢ । गृ꣣णानः꣢ । ह꣣व्य꣡दा꣢तये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये । नि꣢ । हो꣡ता꣢꣯ । स꣣त्सि । बर्हि꣡षि꣢ ॥६६०॥

Mantra without Swara
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥

अग्ने । आ । याहि । वीतये । गृणानः । हव्यदातये । हव्य । दातये । नि । होता । सत्सि । बर्हिषि ॥६६०॥

Samveda - Mantra Number : 660
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मन्! तू (हव्यदातये गृणानः) हमें अपनी भेंट देने के लिए हमारे द्वारा स्तुत किया जाता हुआ प्रतीकाररूप में (वीतये आ याहि) अपनी प्राप्ति के लिए आ जा (होता बर्हिषि नि सत्सि) तू हृदयासन पर होता की भाँति नितरां प्राप्त हो—निरन्तर रमण कर।
Essence
परमात्मा के प्रति स्वात्मसमर्पण करने से परमात्मा की स्तुति की जाती है तो वह अपने साक्षात् दर्शन के लिए आता है और हृदय में विराजमान हो जाता है जैसे होता यज्ञासन पर बैठ जाता है॥१॥
Special
ऋषिः—भरद्वाजो बार्हस्पत्यः (स्तुतिवाणी में कुशल अमृतभोग धारण करनेवाला उपासक)॥ देवता—अग्निः (ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥