Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 652

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ ते꣣ म꣡धु꣢ना꣣ प꣡योऽथ꣢꣯र्वाणो अशिश्रयुः । दे꣣वं꣢ दे꣣वा꣡य꣢ देव꣣यु꣢ ॥६५२॥

अ꣡भि꣢ । ते꣣ । म꣡धु꣢꣯ना । प꣡यः꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯र्वाणः । अ꣣शिश्रयुः । देव꣢म् । दे꣣वा꣡य꣢ । दे꣣व꣢यु ॥६५२॥

Mantra without Swara
अभि ते मधुना पयोऽथर्वाणो अशिश्रयुः । देवं देवाय देवयु ॥

अभि । ते । मधुना । पयः । अथर्वाणः । अशिश्रयुः । देवम् । देवाय । देवयु ॥६५२॥

Samveda - Mantra Number : 652
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ते) हे धारारूप में प्राप्त होने वाले परमात्मन्! तेरे (मधुना) आनन्द रस के साथ “अन्तो वै रसानां मधु” [जै॰ १.१२४] (अथर्वाणः) अचल—स्थिर मननशील योगी जन (देवयुः-देवं पयः) तुझ देव को चाहनेवाले दिव्य प्राण—अमरतत्त्व आत्मभाव को “प्राणः पयः” [श॰ ६.५.४.१५] (देवाय) तुझ परमात्म-देव की प्राप्ति के लिये (अभिशिश्रयुः) मिला देते—नितान्त अर्पित कर देते हैं। तभी तेरा साक्षात् करते हैं।
Essence
स्थिर मन वाले योगी ध्यानी उपासक अपने दिव्य आत्मभाव को जो परमात्मदेव को चाहता है परमात्मदेव की प्राप्ति के लिए समस्त आनन्दों के आनन्द अन्तिम आनन्द में ध्यान द्वारा मिला देते हैं तो अपने आत्मा में उसका साक्षात्कार करते हैं॥२॥
Special