Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 648

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पू꣡र्व꣢स्य꣣ य꣡त्ते꣢ अद्रिवो꣣ꣳऽशु꣢꣯र्मदा꣢꣯य । सु꣣म्न꣡ आ धे꣢꣯हि नो वसो पू꣣र्तिः꣡ श꣢विष्ठ शस्यते । व꣣शी꣢꣫ हि श꣣क्रो꣢ नू꣣नं꣡ तन्नव्य꣢꣯ꣳ सं꣣न्य꣡से꣢ ॥६४८

पू꣡र्व꣢꣯स्य । यत् । ते꣣ । अद्रिवः । अ । द्रिवः । अँशुः꣢ । म꣡दा꣢꣯य । सु꣣म्ने꣢ । आ । धे꣣हि । नः । वसो । पूर्तिः꣢ । श꣣विष्ठ । शस्यते । व꣣शी꣢ । हि । श꣣क्रः꣢ । नू꣣न꣢म् । तत् । न꣡व्य꣢꣯म् । सं꣣न्य꣡से꣢ ॥६४८॥

Mantra without Swara
पूर्वस्य यत्ते अद्रिवोꣳऽशुर्मदाय । सुम्न आ धेहि नो वसो पूर्तिः शविष्ठ शस्यते । वशी हि शक्रो नूनं तन्नव्यꣳ संन्यसे ॥६४८

पूर्वस्य । यत् । ते । अद्रिवः । अ । द्रिवः । अँशुः । मदाय । सुम्ने । आ । धेहि । नः । वसो । पूर्तिः । शविष्ठ । शस्यते । वशी । हि । शक्रः । नूनम् । तत् । नव्यम् । संन्यसे ॥६४८॥

Samveda - Mantra Number : 648

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अद्रिवः) हे ओजस्वी परमात्मन्! (ते पूर्वस्य) तुझ सनातन का (यत्) जो (अंशुः) ध्यान तरंग —स्वरूप झाँकी (मदाय) हर्ष प्राप्ति के लिये है (नः सुम्ने-आधेहि) हमारे सुख के निमित्त “सुम्नं सुखनाम” [निघं॰ ३.६] आधान कर—भली-भाँति समाविष्ट कर (वसो शविष्ठ) हे वसाने वाले अत्यन्त बलवन्! तू (पूर्त्तिः शस्यते) कामनापूरण करने वाला प्रशंसित किया जाता है (नूनम्) निश्चय ही तू (वशी शक्रः) विश्व को वशकर्ता समर्थ है (तत्-नव्यं संन्यसे) तिससे तुझ स्तुति योग्य को हृदय में संस्थापित करता हूँ।
Essence
ओजस्वी परमात्मा सनातन अनादि है, ध्यानोपासन द्वारा उसकी दर्शन झाँकी उपासक के हर्ष का निमित्त है, उसके सुखार्थ परमात्मा उसके अन्दर आधान करता है, वसाने वाले महाबलवान् कामनापूरक की स्तुति करनी चाहिए। उस सब के वश करने वाले स्तुत्यदेव को हृदय में संस्थापित करना चाहिए॥८॥
Special