Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 643

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣢꣫ हि श꣣क्रो꣢ रा꣣ये꣡ वाजा꣢꣯य वज्रिवः । श꣡वि꣢ष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢से꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢स꣣ । आ꣡ या꣢हि꣣ पि꣢ब꣣ म꣡त्स्व꣢ ॥६४३

ए꣣वा꣢ । हि । श꣣क्रः꣢ । रा꣣ये꣢ । वा꣡जा꣢꣯य । व꣣ज्रिवः । श꣡वि꣢꣯ष्ठ । व꣣ज्रिन् । ऋञ्ज꣡से꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठ । व꣣ज्रिन् । ऋञ्ज꣡से꣢ । आ । या꣣हि । पि꣡ब꣢꣯ । म꣡त्स्व꣢꣯ ॥६४३॥

Mantra without Swara
एवा हि शक्रो राये वाजाय वज्रिवः । शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे मꣳहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस । आ याहि पिब मत्स्व ॥६४३

एवा । हि । शक्रः । राये । वाजाय । वज्रिवः । शविष्ठ । वज्रिन् । ऋञ्जसे । मँहिष्ठ । वज्रिन् । ऋञ्जसे । आ । याहि । पिब । मत्स्व ॥६४३॥

Samveda - Mantra Number : 643

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(एव हि) ऐसे ही (शक्र-उ) हे नितान्त सुख देने में शक्त—समर्थ परमात्मन्! (राये) मोक्षैश्वर्य के लिये (वज्रिवः) हे ओजस्वी! “वज्रो वा ओजः” [श॰ ८.४.१.२०] (वाजाय) अमृत अन्नभोग के लिये “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ २.१९३] (शविष्ठ वज्रिन्-ऋञ्जसे) हे अत्यन्त बलवन्! ओजस्वी परमात्मन्! तू हमें समर्थ बनाता है (आयाहि) आजा (पिब) उपासनारस का पानकर—स्वीकार कर (मत्स्व) हम पर प्रसन्न हो।
Essence
ऐसे ही सुखप्रदान में समर्थ परमात्मन्! तू मोक्षैश्वर्य के देने को समर्थ है तथा हे ओजस्वी परमात्मन्! तू अमृत भोग देने के लिये बलवन् परमात्मन्! तू हमें समर्थ बनाता है। हे प्रशंसनीय देव! तू हमारे हृदय में आ। उपासनारस का पानकर—स्वीकार कर, हमें सब प्रकार समृद्ध कर॥३॥
Special