Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 640

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
स꣣प्त꣡ त्वा꣢ ह꣣रि꣢तो꣣ र꣢थे꣣ व꣡ह꣢न्ति देव सूर्य । शो꣣चि꣡ष्के꣢शं विचक्षण ॥६४०॥

स꣣प्त꣢ । त्वा꣣ । हरि꣡तः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । व꣡ह꣢꣯न्ति । दे꣣व । सूर्य । शोचि꣡ष्केश꣢म् । शो꣣चिः꣢ । के꣣शम् । विचक्षण । वि । चक्षण ॥६४०॥

Mantra without Swara
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य । शोचिष्केशं विचक्षण ॥

सप्त । त्वा । हरितः । रथे । वहन्ति । देव । सूर्य । शोचिष्केशम् । शोचिः । केशम् । विचक्षण । वि । चक्षण ॥६४०॥

Samveda - Mantra Number : 640
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विचक्षण सूर्य) हे सर्वद्रष्टा सरणशील—व्यापनशील परमात्मन्! (सप्त हरितः) उक्त समवेत होने वाले तुझे ले आने वाले प्राण (रथे) मेरे शरीररथ में—हृदयसदन में (त्वा शोचिष्केशं वहन्ति) तुझ दीप्त ज्ञान रश्मि वाले को ले आते हैं “केशा रश्मयः” [निरु॰ १२.२६]।
Essence
हे सर्वद्रष्टा व्यापनशील परमात्मन्! ये समवेत हुए प्राण तुझे ले आने वाले मेरे शरीररथ में हृदयसदन में तुझ ज्ञानरश्मियों से दीप्त उपास्यदेव को ले आते हैं जोकि तूने देहरथ में जोड़े हैं। जब तक देहरथ है, तब तक तो तुझे मुझ तक ले आते हैं और जब शरीर से अलग होते हैं, तब मुझे तुझ तक ले जाते हैं॥१४॥
Special