Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 634

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣡दृ꣢श्रन्नस्य के꣣त꣢वो꣣ वि꣢ र꣣श्म꣢यो꣣ ज꣢ना꣣ꣳ अ꣡नु꣢ । भ्रा꣡ज꣢न्तो अ꣣ग्न꣡यो꣢ यथा ॥६३४॥

अ꣡दृ꣢꣯श्रन् । अ꣣स्य । केत꣡वः꣢ । वि । र꣣श्म꣡यः꣢ । ज꣡ना꣢꣯न् । अ꣡नु꣢꣯ । भ्रा꣡ज꣢꣯न्तः । अ꣣ग्न꣡यः꣢ । य꣣था ॥६३४॥

Mantra without Swara
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाꣳ अनु । भ्राजन्तो अग्नयो यथा ॥

अदृश्रन् । अस्य । केतवः । वि । रश्मयः । जनान् । अनु । भ्राजन्तः । अग्नयः । यथा ॥६३४॥

Samveda - Mantra Number : 634
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अस्य केतवः) इस सूर्यरूप परमात्मा के केतु सुझाने वाले सङ्केतित करने वाले (रश्मयः) सर्वत्र व्याप्त गुण (जनान्-अनु) उपासक एवं मननशीलजनों के प्रति (अदृश्रन्) दिखाई पड़ते हैं (यथा भ्राजन्तः-अग्नयः) जैसे जाज्वल्यमान अग्नियाँ दिखलाई पड़ती हैं।
Essence
अहो इस सरणशील—व्यापनशील प्रकाशमान परमात्मा की ज्ञापक गुण रश्मियाँ उपासक एवं मननशीलजनों के प्रति दिखलाई पड़ रही हैं जैसे जाज्वल्यमान अग्नि की ज्वालाएँ साक्षात् दिखलाई पड़ रही होती हैं॥८॥
Special