Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 632

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- सार्पराज्ञी Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त्रि꣣ꣳश꣢꣫द्धाम꣣ वि꣡ रा꣢जति꣣ वा꣡क्प꣢त꣣ङ्गा꣡य꣢ धीयते । प्र꣢ति꣣ व꣢स्तो꣣र꣢ह꣣ द्यु꣡भिः꣢ ॥६३२॥

त्रिँ꣣श꣢त् । धा꣡म꣢꣯ । वि । रा꣣जति । वा꣢क् । प꣣तङ्गा꣡य꣢ । धी꣣यते । प्र꣡ति꣢꣯ । व꣡स्तोः꣢꣯ । अ꣡ह꣢꣯ । द्यु꣡भिः꣢꣯ ॥६३२॥

Mantra without Swara
त्रिꣳशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते । प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥

त्रिँशत् । धाम । वि । राजति । वाक् । पतङ्गाय । धीयते । प्रति । वस्तोः । अह । द्युभिः ॥६३२॥

Samveda - Mantra Number : 632
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पतङ्गाय) मुझ आत्मा में प्राप्त होने वाले परमात्मा के लिये (प्रति वस्तोः-वाक्-धीयते) प्रतिदिन मेरे द्वारा स्तुति आधान की जाती है—समर्पित की जाती है (अह) क्या ही अच्छा है “अह पूजायाम्” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (द्युभिः) अपनी ज्योतियों से मेरे अन्दर (त्रिंशत्-धाम) तीसों घड़ी (विराजति) विशेष भासित रहता है “राजृ दीप्तौ”।
Essence
आत्मा में प्राप्त होने वाले परमात्मा के लिये मुझ उपासक द्वारा प्रतिदिन स्तुति समर्पित की जाती है यह अच्छा है, वह परमात्मा भी अपनी ज्योतियों से तीसों घड़ी—दिन-रात मुझ उपासक के अन्दर विशेष भासित रहता है, मेरी स्तुति रिक्त नहीं जाती और वह भी दया न्याय नहीं त्यागता है॥६॥
Special
ऋषिः—सार्पराज्ञी (वाक्शक्तिसम्पन्न व्यक्ति)॥