Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 63

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- श्यावाश्वो वामदेवो वा Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ जु꣢होता ह꣣वि꣡षा꣢ मर्जय꣣ध्वं नि꣡ होता꣢꣯रं गृ꣣ह꣡प꣢तिं दधिध्वम् । इ꣣ड꣢स्प꣣दे꣡ नम꣢꣯सा रा꣣त꣡ह꣢व्यꣳ सप꣣र्य꣡ता꣢ यज꣣तं꣢ प꣣꣬स्त्या꣢꣯नाम् ॥६३

आ꣢ । जु꣣होत । हवि꣡षा꣢ । म꣣र्जयध्वम् । नि꣢ । हो꣡ता꣢꣯रम् । गृ꣣ह꣡प꣢तिम् । गृ꣣ह꣢ । प꣣तिम् । दधिध्वम् । इडः꣢ । प꣣दे꣢ । न꣡म꣢꣯सा । रा꣣त꣡ह꣢व्यम् । रा꣣त । ह꣣व्यम् । सपर्य꣡त꣢ । य꣣जत꣢म् । प꣣स्त्या꣢꣯नाम् ॥६३॥

Mantra without Swara
आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम् । इडस्पदे नमसा रातहव्यꣳ सपर्यता यजतं पस्त्यानाम् ॥६३

आ । जुहोत । हविषा । मर्जयध्वम् । नि । होतारम् । गृहपतिम् । गृह । पतिम् । दधिध्वम् । इडः । पदे । नमसा । रातहव्यम् । रात । हव्यम् । सपर्यत । यजतम् । पस्त्यानाम् ॥६३॥

Samveda - Mantra Number : 63
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(हविषा-आजुहोत) हे उपासकजनो! उस स्वतेजःस्वरूप परमात्मा को समन्तरूप से आमन्त्रित करो (हविषामर्जयध्वम्) श्रद्धारूप भेंट से प्रेरित करो “मर्जयन्त गमयन्त” [निरु॰ १२.४३] (होतारं गृहपतिं निदधिध्वम्) स्वीकार करने वाले हृदयसदन के स्वामी परमात्मा को अपने अन्दर ध्यान से धारण करो (पस्त्यानां यजतम्) प्रजाओं—मनुष्यों के “विशो वै पस्त्याः” [श॰ ५.३.५.१९] “विशो मनुष्यनाम” [निघं॰ २.३] यजनीय-सङ्गमनीय—(राहतव्यम्) दिए हैं भोग पदार्थ जिसने उस ऐसे परमात्मा को (इडः-पदे) श्रद्धा के स्थान हृदय में—स्वात्मा में “श्रद्धा इडा” [तै॰ सं॰ १.७.२.५] (नमसा सपर्यत) नम्रस्तुति से पूजित करो—सत्कृत करो—सेवन करो।
Essence
मनुष्यमात्र के यजनीय-सङ्गमनीय भोगप्रद तेजःस्वरूप परमात्मा का श्रद्धा के साथ हृदयसदन में नम्रस्तुति द्वारा सत्कार करो अपने अन्दर श्रद्धा, वैराग्य से आमन्त्रित कर आत्मसमर्पण स्नेह धारा को उसकी ओर प्रेरित कर निरन्तर ध्यान करें, इसमें मानव का उत्थान और आत्मकल्याण है॥१॥
Special
ऋषिः—श्यावाश्वो वामदेवो वा (प्रगतिशील निर्दोष इन्द्रिय—घोड़ों वाला या वननीय परमात्मदेव वाला उपासक)॥ छन्दः—१, ३, ५-९ त्रिष्टुप्; २, ४ जगती, १० त्रिपाद् विराड् गायत्री॥ स्वरः—१,३, ५-६ धैवतः;