Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 621

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- नारायणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त꣡तो꣢ वि꣣रा꣡ड꣢जायत वि꣣रा꣢जो꣣ अ꣢धि꣣ पू꣡रु꣢षः । स꣢ जा꣣तो꣡ अत्य꣢꣯रिच्यत प꣣श्चा꣢꣫द्भूमि꣣म꣡थो꣢ पु꣣रः꣢ ॥६२१॥

त꣡तः꣢꣯ । वि꣣रा꣢ट् । वि꣣ । रा꣢ट् । अ꣣जायत । वि꣣रा꣢जः । वि꣣ । रा꣡जः꣢꣯ । अ꣡धि꣢꣯ । पू꣡रु꣢꣯षः । सः । जा꣣तः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣣रिच्यत । पश्चा꣢त् । भू꣡मि꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । पुरः꣢ ॥६२१॥

Mantra without Swara
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥

ततः । विराट् । वि । राट् । अजायत । विराजः । वि । राजः । अधि । पूरुषः । सः । जातः । अति । अरिच्यत । पश्चात् । भूमिम् । अथ । उ । पुरः ॥६२१॥

Samveda - Mantra Number : 621
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(ततः-विराट्-अजायत) उस पूर्ण पुरुष परमात्मा से विराट्—विविध पदार्थों से राजमान ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ (विराजः-अधि पूरुषः) विराट्—ब्रह्माण्ड के ऊपर उसका अधिनायक पूर्ण पुरुष परमात्मा है (पश्चात् सः-जातः) पश्चात् उस उत्पन्न हुए विराट्—ब्रह्माण्ड ने परमात्मा के अधिष्ठातृत्व में (भूमिम्-अथ पुरः-अति-अरिच्यत) उत्पत्ति स्थान—लोकमात्र को इसके अनन्तर पुरों—जीव शरीरों को अतिशय से विरचित किया—बाहिर निकाला—प्रकट किया॥
Essence
पूर्ण पुरुष परमात्मा ब्रह्माण्ड को उत्पन्न कर इसका अधिष्ठाता बना, फिर ब्रह्माण्ड का विस्तार भूमि आदि भिन्न-भिन्न लोकों में हुआ, उन पर भिन्न-भिन्न प्राणिदेह—जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज हुए, जिनमें जीवात्मा बन्धे हैं। उस उत्पन्नकर्ता परमात्मा को मान और जानकर उसकी स्तुति-प्रार्थना-उपासना करके बन्धन से छूट मोक्ष और ब्रह्मानन्द को पाता है॥७॥
Special
ऋषिः—नारायणः (नाराः—नर जिसके सूनुसन्तान हैं ऐसे “आपः-नाराः” अयनज्ञान का आश्रय जिसका हो)॥ देवता—स्रष्टा॥ छन्दः—अनुष्टुप्॥