Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 620

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
ता꣡वा꣢नस्य महि꣣मा꣢꣫ ततो꣣ ज्या꣡या꣢ꣳश्च꣣ पू꣡रु꣢षः । उ꣣ता꣡मृ꣢त꣣त्व꣡स्येशा꣢꣯नो꣣ य꣡दन्ने꣢꣯नाति꣣रो꣡ह꣢ति ॥६२०॥

ता꣡वा꣢꣯न् । अ꣣स्य । महिमा꣢ । त꣡तः꣢꣯ । ज्या꣡या꣢꣯न् । च꣣ । पू꣡रु꣢꣯षः । उ꣣त꣢ । अ꣣मृतत्व꣡स्य꣢ । अ꣣ । मृतत्व꣡स्य꣢ । ई꣡शा꣢꣯नः । यत् । अ꣡न्ने꣢꣯न । अ꣣तिरो꣡ह꣢ति । अ꣣ति । रो꣡ह꣢꣯ति ॥६२०॥

Mantra without Swara
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाꣳश्च पूरुषः । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥

तावान् । अस्य । महिमा । ततः । ज्यायान् । च । पूरुषः । उत । अमृतत्वस्य । अ । मृतत्वस्य । ईशानः । यत् । अन्नेन । अतिरोहति । अति । रोहति ॥६२०॥

Samveda - Mantra Number : 620
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(तावान्-अस्य महिमा) उतना एक पाद मात्र उत्पन्न और उत्पन्न होने वाला भौतिक जगत् यह सब पूर्ण पुरुष परमात्मा की महिमा—स्थूल दृष्टि से परिचय कराने वाली है (च) और (ततः-ज्यायान् पूरुषः) उससे अधिक महान् पूर्ण पुरुष परमात्मा है (उत) और वह (अमृतत्वस्य-ईशानः) त्रिपादरूप अमृतस्वरूप का ईश है—स्वामी है (यत्-अन्नेन-अतिरोहति) जोकि कर्मफल भोग से—भोग का लक्ष्य बना जगत् में आकर अतिरोहण करता है—मोक्ष की ओर जाता है उस जीववर्ग का भी स्वामी है।
Essence
जितना भी भौतिक जगत् है, जो उत्पन्न हुआ या होने वाला है, वह सब पूर्ण पुरुष परमात्मा की महिमा मात्र है। पुरुष परमात्मा तो इससे महान् है। वह अमृतत्व का स्वामी है और जो कर्मफल भोग के लक्ष्य से आकर पुनः मोक्ष की ओर भी अतिरोहण करता है, उस जीववर्ग का भी स्वामी है, उसे ऐसे पुरुष की शरण लेना कल्याणकर है॥६॥
Special
ऋषिः—नारायणः (नाराः—नर जिसके सूनुसन्तान हैं ऐसे “आपः-नाराः” अयनज्ञान का आश्रय जिसका हो)॥ देवता—पुरुषः (सृष्टिपुर में बसा हुआ पूर्णपुरुष परमात्मा)॥ छन्दः—अनुष्टुप्॥