Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 614

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
पा꣢त्य꣣ग्नि꣢र्वि꣣पो꣡ अग्रं꣢꣯ प꣣दं꣢꣯ वेः पाति꣢꣯ य꣣ह्व꣡श्चर꣢꣯ण꣣ꣳ सू꣡र्य꣢स्य । पा꣢ति꣣ ना꣡भा꣢ स꣣प्त꣡शी꣢र्षाणम꣣ग्निः꣡ पाति꣢꣯ दे꣣वा꣡ना꣢मुप꣣मा꣡द꣢मृ꣣ष्वः꣢ ॥६१४॥

पा꣡ति꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । वि꣣पः꣢ । अ꣡ग्र꣢꣯म् । प꣣द꣢म् । वेः । पा꣡ति꣢꣯ । य꣣ह्वः꣢ । च꣡र꣢꣯णम् । सू꣡र्य꣢꣯स्य । पा꣡ति꣢꣯ । ना꣡भा꣢꣯ । स꣣प्त꣡शी꣢र्षाणम् । स꣣प्त꣢ । शी꣣र्षाणम् । अग्निः꣢ । पा꣡ति꣢꣯ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । उ꣣पमा꣡द꣢म् । उ꣣प । मा꣡द꣢꣯म् । ऋ꣣ष्वः꣢ ॥६१४॥

Mantra without Swara
पात्यग्निर्विपो अग्रं पदं वेः पाति यह्वश्चरणꣳ सूर्यस्य । पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपमादमृष्वः ॥

पाति । अग्निः । विपः । अग्रम् । पदम् । वेः । पाति । यह्वः । चरणम् । सूर्यस्य । पाति । नाभा । सप्तशीर्षाणम् । सप्त । शीर्षाणम् । अग्निः । पाति । देवानाम् । उपमादम् । उप । मादम् । ऋष्वः ॥६१४॥

Samveda - Mantra Number : 614
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विपः-अग्निः) विपश्चित्—सर्वज्ञ अग्रणायक परमात्मा “विपः-मेधावी” [निघं॰ ३.१५] (वेः-अग्रं पदं पाति) गतिशील निरन्तर अतनशील आत्मा के अगले पद—जन्मान्तर देह की रक्षा करता है कर्मानुसार सुरक्षित रखता है (यह्वः) महान् अग्रणेता परमात्मा “यह्वः-महन्नाम” [निघं॰ ३.३] (सूर्यस्य चरणं पाति) विद्यासूर्य विद्वान् सब इन्द्रियों के स्वामी वशीकर्ता जीवन्मुक्त आत्मा के “तं सर्वाणि भूतानि सोऽर्य सोऽर्य इत्ययन् तत्सोऽर्यस्य सोऽर्यत्वं सोऽर्यो नामैष तं सूर्य इति परोक्षमाचक्षते” [जै॰ ३.३.५७] “सूर्य आत्मा” [तै॰ सं॰ १.४.४३.१] सेवन करने योग्य मोक्ष की रक्षा वाला है (नाभा) नाभि—प्राणों को बान्धने वाला अग्रणेता परमात्मा “नाभिर्वै प्राणान् दाधार” [काठ॰ ३७.१६] (सप्तशीर्षाणं पाति) सात ऊपरी प्राण वाले आत्मा की रक्षा करता है “प्राणो वै शिरः” [जै॰ १.२.६८] (ऋष्वः) सबको प्राप्त महान् परमात्मा (देवानाम्-उपमादम्) समस्त उपासक विद्वानों के अभ्युदयरूप सांसारिक हर्षकारी सुख की भी रक्षा करता है।
Essence
सर्वज्ञ अग्रणेता परमात्मा एक देह से दूसरे देह में जाने वाले आत्मा के अगले जन्म की रक्षा करता है—उसे नियत करता है। वह प्राणों को बान्धने वाला सात ऊपर प्राणों—दो आँखों दो कानों दो नासिकछिद्रों एक मुख से उचित कार्य लेने वाले संयमी की रक्षा करता है, सच्चा सुख प्राप्त कराता है, जीवन्मुक्त की रक्षा करता है॥१३॥
Special
ऋषिः—विश्वामित्रः (सबका मित्र उदार उपासक)॥