Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 591

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- एकपात् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
इ꣣मं꣡ वृष꣢꣯णं कृणु꣣तै꣢꣫क꣣मि꣢न्माम् ॥५९१

इ꣣म꣢म् । वृ꣡ष꣢꣯णम् । कृ꣣णुत । ए꣡क꣢꣯म् । इत् । माम् ॥५९१॥

Mantra without Swara
इमं वृषणं कृणुतैकमिन्माम् ॥५९१

इमम् । वृषणम् । कृणुत । एकम् । इत् । माम् ॥५९१॥

Samveda - Mantra Number : 591
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
हे विश्वेदेवो—प्राणो! (इमं माम्) इस मुझे (उत) अपि—हाँ! (वृषणम्-एकम्-इत् कृणुत) सुखवर्षक केवल स्वस्वरूप में अवश्य कर दो।
Essence
हे मेरे प्राणो! सुखों की प्राप्ति के लिये मैं पराधीन होकर न रहूँ और न ऐसे इन्द्रिय सुख का व्यसन रहे जो मेरे केवल स्वरूप से पृथक् कर दे, अपितु वे सुख मेरे चेतन स्वरूप के दास रहें, मैं उनका दास न बनूँ, हाँ वास्तविक स्वस्वरूप में आकर जो परमात्मा का आनन्द है, उसे ही उसके आधार पर अपने अन्दर सींचता रहूँ “परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते” [छान्दो॰ ८.१२.३]॥६॥
Special
ऋषिः—वामदेवः (वननीय परमात्मदेव जिसका है ऐसा उपासक)॥ देवता—विश्वेदेवाः (प्राण१)॥ छन्दः—एकपदा गायत्री॥