Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 586

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जि꣢ष्ठं꣣ पु꣡पु꣢रि꣣ श्र꣡वः꣢ । य꣡द्दिधृ꣢꣯क्षेम वज्रहस्त꣣ रो꣡द꣢सी꣣ उ꣢꣯भे सु꣢꣯शिप्र पप्राः ॥५८६॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । ज्ये꣡ष्ठ꣢म् । नः꣣ । आ꣢ । भ꣣र । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठम् । पु꣡पु꣢꣯रि । श्र꣡वः꣢꣯ । यत् । दि꣡धृ꣢꣯क्षेम । व꣣ज्रहस्त । वज्र । हस्त । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ । सु꣣शिप्र । सु । शिप्र । पप्राः ॥५८६॥

Mantra without Swara
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः । यद्दिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः ॥

इन्द्र । ज्येष्ठम् । नः । आ । भर । ओजिष्ठम् । पुपुरि । श्रवः । यत् । दिधृक्षेम । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । रोदसीइति । उभेइति । सुशिप्र । सु । शिप्र । पप्राः ॥५८६॥

Samveda - Mantra Number : 586
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वज्रहस्त-इन्द्र) हे ओजरूप हस्तवाले—पापहननसाधन वाले ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! “वज्रो वा ओजः” [श॰ ८.४.१.२०] (नः) हमारे लिये (ज्येष्ठम्) सर्वमहान् (ओजिष्ठम्) अत्यन्त आत्मबलयुक्त—ऊँचे आध्यात्मिक (श्रवः) अन्न—आनन्दभोग को (आभर) आभरित कर—प्रदान कर (यत्) जिसे (दिधृक्षेम) हम धारण करना चाहते हैं (सुशिप्र) हे व्यापन गति वाले तू (उभे रोदसी) दोनों द्युलोक पृथिवीलोक को (पप्राः) अपनी व्यापकता से पूर्ण किए हुए—भरे हुए है, अतः हमारे अन्दर अपना आनन्दभोग भर दे।
Essence
हे ओजरूप पापहननसाधन वाले ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू हमारे लिये सर्वमहान्—सर्वोत्तम अत्यन्त ओजपूर्ण तृप्तिकारक आनन्दभोग को प्रदान कर जिसे हम धारण करना चाहते हैं। हे सुन्दर व्यापनगति वाले तू ऊपर नीचे के दोनों द्युलोक पृथिवीलोक को अपनी व्यापकता से पूर्ण कर रहा है—भरता है, अतः हमारे अन्दर भी श्रेष्ठ आनन्दभोग को भर दे॥१॥
Footnote
[*44. “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ १.१९३]।]
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (अमृत अन्नभोग को अपने अन्दर धारण करने वाला उपासक*44)॥ देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा) छन्दः—बृहती॥