Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 563

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वत्सप्रिर्भालन्दः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ दे꣣व꣢꣫मच्छा꣣ म꣡धु꣢मन्त꣣ इ꣢न्द꣣वो꣡ऽसि꣢ष्यदन्त꣣ गा꣢व꣣ आ꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ । ब꣣र्हिष꣡दो꣢ वच꣣ना꣡व꣢न्त꣣ ऊ꣡ध꣢भिः परि꣣स्रु꣡त꣢मु꣣स्रि꣡या꣢ नि꣣र्णि꣡जं꣢ धिरे ॥५६३॥

प्र꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣡च्छ꣢꣯ । म꣡धु꣢꣯मन्तः । इ꣡न्द꣢꣯वः । अ꣡सि꣢꣯ष्यदन्त । गा꣡वः꣢꣯ । आ । न । धे꣣न꣡वः꣢ । ब꣣र्हि꣡षदः꣢ । ब꣣र्हि । स꣡दः꣢꣯ । व꣣चना꣡व꣢न्तः । ऊ꣡ध꣢꣯भिः । प꣣रिस्रु꣡त꣢म् । प꣣रि । स्रु꣡त꣢꣯म् । उ꣣स्रि꣡याः꣢ । उ꣣ । स्रि꣡याः꣢꣯ । नि꣣र्णि꣡ज꣢म् । निः꣣ । नि꣡ज꣢꣯म् । धि꣣रे ॥५६३॥

Mantra without Swara
प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवोऽसिष्यदन्त गाव आ न धेनवः । बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुस्रिया निर्णिजं धिरे ॥

प्र । देवम् । अच्छ । मधुमन्तः । इन्दवः । असिष्यदन्त । गावः । आ । न । धेनवः । बर्हिषदः । बर्हि । सदः । वचनावन्तः । ऊधभिः । परिस्रुतम् । परि । स्रुतम् । उस्रियाः । उ । स्रियाः । निर्णिजम् । निः । निजम् । धिरे ॥५६३॥

Samveda - Mantra Number : 563
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(मधुमन्तः-इन्दवः) मधुर रसीला आनन्दस्वरूप परमात्मा ‘बहुवचनमादर्राथम्’ (देवम्-अच्छा) इन्द्रियदेवों के अधिराज इन्द्र—आत्मा को लक्ष्य कर “इन्द्रो वै देवानामधिराजः” [मै॰ २.२.११] या मन को लक्ष्य कर “मनो देवः” [गो॰ १.२.१०] (प्र-आ-असिष्यन्दत) प्रकृष्ट एवं समन्तपूर्णरूप से स्रवित होता है (धेनवः-गावः-न) दुधारी गौओं की भाँति, जैसे गौएँ बछड़े को लक्ष्य कर दूधरूप स्वरस स्रवित करती हैं और जबकि (बर्हिषदः-वचनवन्तः) हृदयावकाश में प्राप्त हो प्रवचन करते हुए होते हैं, तब (उस्रियाः-ऊधभिः) गौएँ जैसे “उस्रिया गोनाम” [निघं॰ २.११] दुग्धाधार स्थलों से (परिस्रुतं निर्णिजं धिरे) धारारूप में निकले शुद्ध दूध को धारण करते हैं वह भी ऐसे शुद्ध आनन्दरस को धारण करता है।
Essence
मधुर रसीला आनन्दस्वरूप परमात्मा मन या आत्मा को लक्ष्य कर प्रबल और समन्त पूर्णरूप से स्रवित होता है, हृदयाकाश में विराजमान हो, प्रवचन प्रपूर्ण हुआ प्रवचनामृत प्रदान करता है। दुधारु गौओं की भाँति, जैसे गौओं के गोष्ठ—गोसदन में बछड़े के प्रति निर्मल दूध को दुग्धस्थलों से गौएँ स्रवित करती हैं॥१०॥
Footnote
[*41. “मन एव वत्सः” [श॰ ११.३.१.१]।]
Special
ऋषिः—वत्सप्रीः (मन को परमात्मा के प्रेम से पूरित करने वाला*41 उपासक)॥