Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 553

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यास्यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ त꣡द्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡स꣢ꣳ ह꣣ता꣢ म꣣खं꣡ न भृग꣢꣯वः ॥५५३॥

प्र꣢ । सु꣣न्वाना꣡य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡र्तः꣢꣯ । न । व꣣ष्ट । त꣢त् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । अ꣣राध꣡स꣢म् । अ꣣ । राध꣡स꣢म् । ह꣣त꣢ । म꣣ख꣢म् । न । भृ꣡ग꣢꣯वः ॥५५३॥

Mantra without Swara
प्र सुन्वानायास्यान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः । अप श्वानमराधसꣳ हता मखं न भृगवः ॥

प्र । सुन्वानाय । अन्धसः । मर्तः । न । वष्ट । तत् । वचः । अप । श्वानम् । अराधसम् । अ । राधसम् । हत । मखम् । न । भृगवः ॥५५३॥

Samveda - Mantra Number : 553
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अन्धसः) आध्यानीय—आराधनीय शान्तस्वरूप परमात्मा को (प्रसुन्वानाय) प्रसिद्ध करने—साक्षात् करने वाले मुमुक्षु का “षष्ठ्यर्थे चतुर्थी वक्तव्या” (तद्वचः) परमात्मविषयक वचन (मर्त्तः) जो मनुष्य (न वष्ट) “अवष्ट-छन्दस्यमाङ्योगेऽपि-अडभावः” नहीं चाहता है अपितु निन्दक नास्तिक नास्तिकभाव से अनादर करता है (अराधसं श्वानम्-अपहत) उस राधना—उपासना न करने वाले अपितु कृतघ्न या कुत्ते के समान कामभाव को नष्ट करो (मखं न भृगवः) ज्ञानाग्नि से जाज्वल्यमान आत्मा जिनका हो ऐसे ज्ञानीजन “भृगुर्भृज्यमानो न देहे” [निरु॰ ३.१७] मख—ज्ञानरहित गतिकर्म “मख गत्यर्थः” [भ्वादि॰] को जैसे दूर करते हैं, ऐसे करें।
Essence
आध्यानीय—आराधनीय शान्त परमात्मा का साक्षात् करने वाले मुमुक्षु उपासक के परमात्मसम्बन्धी उपदेश को जो नहीं सुनना चाहता है, अपितु विरोध करता है, उस ऐसे नास्तिक एवं कामी या कामभाव को कुत्ते के समान अलग कर दें। जैसे ज्ञानीजन ज्ञानहीन कर्म को अपने से अलग कर देते हैं॥९॥
Special
ऋषिः—प्रजापतिर्वैश्वामित्रः (सर्वमित्र से सम्बद्ध निज इन्द्रियों का पालक रक्षक संयमी उपासक)॥ छन्दः—अनुष्टुप्।