Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 538

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नोधा गौतमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सा꣣कमु꣡क्षो꣢ मर्जयन्त꣣ स्व꣡सा꣢रो꣣ द꣢श꣣ धी꣡र꣢स्य धी꣣त꣢यो꣣ ध꣡नु꣢त्रीः । ह꣢रिः꣣ प꣡र्य꣢द्रव꣣ज्जाः꣡ सूर्य꣢꣯स्य꣣ द्रो꣡णं꣢ ननक्षे꣣ अ꣢त्यो꣣ न꣢ वा꣣जी꣢ ॥५३८॥

सा꣣कमु꣡क्षः꣢ । सा꣣कम् । उ꣡क्षः꣢꣯ । म꣣र्जयन्त । स्व꣡सा꣢꣯रः । द꣡श꣢꣯ । धी꣡र꣢꣯स्य । धी꣣त꣡यः꣢ । ध꣡नु꣢꣯त्रीः । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣द्रवत् । जाः꣢ । सू꣡र्य꣢꣯स्य । सु । ऊ꣣र्यस्य । द्रो꣡णं꣢꣯ । न꣣नक्षे । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । वा꣣जी꣢ ॥५३८॥

Mantra without Swara
साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः । हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी ॥

साकमुक्षः । साकम् । उक्षः । मर्जयन्त । स्वसारः । दश । धीरस्य । धीतयः । धनुत्रीः । हरिः । परि । अद्रवत् । जाः । सूर्यस्य । सु । ऊर्यस्य । द्रोणं । ननक्षे । अत्यः । न । वाजी ॥५३८॥

Samveda - Mantra Number : 538
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(धीरस्य) ध्यानवान्—ध्यानी की “धीराःप्रज्ञानवन्तो ध्यानवन्तः” [निरु॰ ४.९] (धनुत्रीः) प्रेरित करने वाली “धन्वति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] “धवि गत्यर्थः” [भ्वादि॰] ‘छान्दसं रूपं तृजन्तम्’ (धीतयः) प्रज्ञाएँ “ऋतस्य धीतिः.....ऋतस्य प्रज्ञा” [निरु॰ १०.४०] अथवा ध्यानयोग क्रियाएँ “धीतिभिः-कर्मभिः” [निरु॰ ११.१६] (साकम्-उक्षः) एक साथ सींचने वाली—ध्यान में तृप्त करने वाली (दश स्वसारः) ध्यानी को परमात्मा में सु—सम्यक् फेंकने वाली दश इन्द्रियों सम्बन्धी संयत प्रज्ञाएँ या क्रियाएँ “स्वसा-सु-असा” [निरु॰ ११.३३] (मर्जयन्त) धीर—ध्यानवान् को परमात्मा में पहुँचाती हैं “मर्जयन्त गमयन्त” [निरु॰ १२.४३] (हरिः सूर्यस्य जाः पर्यद्रवत्) दुःखापहर्ता सुखाहर्ता शान्त परमात्मा अपनी ओर सरणशील योगी की उद्भूत भावनाओं के प्रति “सोऽर्यः सोऽर्य इत्यायन्-सोऽर्य ह वै नामैष तं सूर्य इति परोक्षमाचक्षते” [जै॰ ३.३५७] परिद्रवित हो जाता है, पुनः (अत्यः-न वाजी द्रोणं ननक्षे) निरन्तर गमनशील घोड़े की भाँति हृदयसदन में प्राप्त हो जाता है घोड़ा जैसे अन्त में तबेले में आ जाता है।
Essence
ध्यानवान् योगी की प्रेरिका प्रज्ञाएँ एवं ध्यान क्रियाएँ एक साथ उसे तृप्त करती हुईं परमात्मा की ओर प्रेरित करती हुईं तथा दशों इन्द्रियों की संयत प्रज्ञाएँ या क्रियाएँ भी परमात्मा की ओर ले जाती हैं, पुनः दुःखापहर्ता सुखाहर्ता परमात्मा की सरणशील उपासक आत्मा की उद्भूत भावनाओं के प्रति पूर्ण द्रवित हो जाता है। अन्ततः वह निरन्तर गमनशील घोड़े की भाँति हृदयसदन में ऐसे प्राप्त हो जाता है जैसे घोड़ा अपने तबेले में सहज स्वभाव से पहुँच जाता है॥६॥
Special
ऋषिः—नोधाः (नवन—स्तवन को धारण करने वाला उपासक)॥