Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 535

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ गा꣢यता꣣꣬भ्य꣢꣯र्चाम दे꣣वा꣡न्त्सोम꣢꣯ꣳ हिनोत मह꣣ते꣡ धना꣢꣯य । स्वा꣣दुः꣡ प꣢वता꣣मति꣣ वा꣢र꣣म꣢व्य꣣मा꣡ सी꣢दतु क꣣ल꣡शं꣢ दे꣣व꣡ इन्दुः꣢꣯ ॥५३५॥

प्र꣢ । गा꣣यता । अभि꣢ । अ꣣र्चाम । देवा꣢न् । सो꣡म꣢꣯म् । हि꣣नोत । महते꣢ । ध꣡ना꣢꣯य । स्वा꣣दुः꣢ । प꣣वताम् । अ꣡ति꣢꣯ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡व्य꣢꣯म् । आ । सी꣣दतु । कल꣡श꣢म् । दे꣣वः꣢ । इ꣡न्दुः꣢꣯ ॥५३५॥

Mantra without Swara
प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोमꣳ हिनोत महते धनाय । स्वादुः पवतामति वारमव्यमा सीदतु कलशं देव इन्दुः ॥

प्र । गायता । अभि । अर्चाम । देवान् । सोमम् । हिनोत । महते । धनाय । स्वादुः । पवताम् । अति । वारम् । अव्यम् । आ । सीदतु । कलशम् । देवः । इन्दुः ॥५३५॥

Samveda - Mantra Number : 535
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(देवान्) हे मुमुक्षुजनो! “सुपां सुपो भवन्तीति जसः स्थाने शस्” (महते धनाय) महान् धन—मोक्षैश्वर्य प्राप्ति के लिये (सोमम्) शान्तस्वरूप परमात्मा को (प्रगायत) प्रकृष्टरूप से गाओ—स्तुति में लाओ (अभ्यर्चाम) उसे भली प्रकार अर्चित करो—उपासना में लाओ ‘अत्र पुरुषव्यत्ययः’ (हिनोत) प्रार्थित करो—प्रार्थना में लाओ। (स्वादुः-इन्दुः-देवः) मधुर स्वाद वाला रसभरा आर्द्र—शान्त परमात्मदेव (अव्यं वारम्-अति) पार्थिव आवरक शरीर को अतिक्रमण करके (पवताम्) प्राप्त हो (कलशं सीदतु) कला—अङ्ग-अङ्ग जिसके आश्रय में रहते हैं उसमें विराजमान हो जावे।
Essence
मुमुक्षुजनो! मोक्षैश्वर्य की प्राप्ति के लिये शान्त परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करो, इससे वह मधुर स्वाद वाला रसीला परमात्मदेव पार्थिवदेह को लाङ्घकर अन्दर आत्मा में विराजमान हो जाता है॥३॥
Special
ऋषिः—इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाले से सम्बद्ध विद्युत् जैसी कान्ति वाला)॥