Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 532

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रतर्दनो दैवोदासिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम꣣ म꣡धु꣢माꣳ ऋ꣣ता꣢वा꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ । अ꣢व꣣ द्रो꣡णा꣢नि घृ꣣त꣡व꣢न्ति रोह म꣣दि꣡न्त꣢मो मत्स꣣र꣡ इ꣢न्द्र꣣पा꣡नः꣢ ॥५३२॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । म꣡धु꣢꣯मान् । ऋ꣣ता꣡वा꣢ । अ꣣पः꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡नौ꣢꣯ । अ꣡व्ये꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । द्रो꣡णा꣢꣯नि । घृ꣣त꣡व꣢न्ति । रो꣣ह । मदि꣡न्त꣢मः । म꣣त्सरः꣢ । इ꣣न्द्रपा꣡नः꣢ । इ꣣न्द्र । पा꣡नः꣢꣯ ॥५३२॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम मधुमाꣳ ऋतावापो वसानो अधि सानो अव्ये । अव द्रोणानि घृतवन्ति रोह मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः ॥

पवस्व । सोम । मधुमान् । ऋतावा । अपः । वसानः । अधि । सानौ । अव्ये । अव । द्रोणानि । घृतवन्ति । रोह । मदिन्तमः । मत्सरः । इन्द्रपानः । इन्द्र । पानः ॥५३२॥

Samveda - Mantra Number : 532
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (मधुमान्) मधुररसवाला (ऋतावा) अमृतवाला “ऋतममृतमित्याह” [जै॰ २.१६०] (अपः-वसानः) प्राणों को आच्छादित करता हुआ—सुरक्षित रखता हुआ “आपो वै प्राणाः” [श॰ ३.८.२.४] (अव्ये-अधि) रक्षणीय हृदय मर्मस्थान में (सानः) सम्भजनीय होता हुआ (पवस्व) आनन्दधारा में प्राप्त हो (मदिन्तमः) अत्यन्त हर्षकारी (मत्सरः) हर्षभरा (इन्द्रपानः) उपासक आत्मा के पान करने योग्य हुआ (घृतवन्ति) तेज वाले तेजस्वी “तेजो वै घृतम्” [मै॰ १.६.८] (द्रोणानि-अवरोह) प्राणों को—प्राणों की ओर अवरोहण कर “प्राणा वै द्रोणकलशः” [मै॰ ४.५.९]।
Essence
हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू मधुमय—अमृत स्वामी प्राणों को सुरक्षित रखता हुआ रक्षणीय हृदय मर्मस्थान में सम्भजनीय हुआ आनन्दधारा में प्राप्त हो अपितु अत्यन्त आनन्दप्रद हर्षभरा हुआ उपासक आत्मा के पान करने योग्य हो और तेजस्वी जीवन वाले प्राणों में अवतरित हो रहा है॥१०॥
Special
ऋषिः—प्रतर्दनः (काम आदि दोषों को नष्ट करने वाला उपासक)॥