Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 53

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
का꣡य꣢मानो व꣣ना꣢꣫ त्वं यन्मा꣣तॄ꣡रज꣢꣯गन्न꣣पः꣢ । न꣡ तत्ते꣢꣯ अग्ने प्र꣣मृ꣡षे꣢ नि꣣व꣡र्त꣢नं꣣ य꣢द्दू꣣रे꣢꣫ सन्नि꣣हा꣡भुवः꣢ ॥५३॥

का꣡य꣢꣯मानः । व꣣ना꣢ । त्वम् । यत् । मा꣣तॄः꣢ । अ꣡ज꣢꣯गन् । अ꣣पः꣢ । न । तत् । ते꣣ । अग्ने । प्रमृ꣡षे꣢ । प्र꣣ । मृ꣡षे꣢꣯ । नि꣣ । व꣡र्त्त꣢꣯नम् । यत् । दू꣣रे꣢ । दुः꣣ । ए꣢ । सन् । इ꣣ह꣢ । अ꣡भु꣢꣯वः ॥५३॥

Mantra without Swara
कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः । न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद्दूरे सन्निहाभुवः ॥

कायमानः । वना । त्वम् । यत् । मातॄः । अजगन् । अपः । न । तत् । ते । अग्ने । प्रमृषे । प्र । मृषे । नि । वर्त्तनम् । यत् । दूरे । दुः । ए । सन् । इह । अभुवः ॥५३॥

Samveda - Mantra Number : 53
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे परमात्मन्! तू (वना कायमानः) ज्ञानतन्तुओं—वैराग्यभावनाओं को चाहता हुआ मेरे प्रमाद से (यत्-मातृः-अपः-अजगन्) जो वैराग्यशून्य अभ्यासमात्र के द्वारा नाड़ियों प्राणों के प्रति चला गया—छिप गया साक्षात् न हो सका (तत् ते निवर्तनं न प्रमृषे) तेरा वह यह मेरी ज्ञानदृष्टि वैराग्यदृष्टि से हट जाना सहन नहीं करता हूँ (यत्-दूरे सन्-इह-अभुवः) कि तू मेरे ध्यान से दूर होता हुआ यहाँ मेरे अन्दर साक्षात् हो सके।
Essence
परमात्मा का साक्षात्कार अभ्यास और वैराग्य से होता है, वैराग्य का स्थान ऊँचा है “तस्य परं वैराग्यमुपायः” [योग॰ १.१८ व्यास॰] असम्प्रज्ञात् समाधि का उपाय परवैराग्य है, उसे प्रमाद से त्याग कर अभ्यासमात्र से परमात्मा के साक्षात्कार की आशा रखना तो परमात्मा को अपने से दूर करना है॥९॥
Special
ऋषिः—विश्वामित्रः (सबका मित्र और सबको मित्र बनाने वाला उपासक)॥