Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 52

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ध꣣ ज्मो꣡ अध꣢꣯ वा दि꣣वो꣡ बृ꣢ह꣣तो꣡ रो꣢च꣣ना꣡दधि꣢꣯ । अ꣣या꣡ व꣢र्धस्व त꣣꣬न्वा꣢꣯ गि꣣रा꣢꣫ ममा जा꣣ता꣡ सु꣢क्रतो पृण ॥५२॥

अ꣡ध꣢꣯ । ज्मः । अ꣡ध꣢꣯ । वा꣣ । दिवः꣢ । बृ꣣हतः꣢ । रो꣣चना꣢त् । अधि꣢꣯ । अ꣣या꣢ । व꣣र्धस्व । त꣡न्वा꣢꣯ । गि꣣रा꣢ । म꣡म꣢꣯ । आ । जा꣣ता꣢ । सु꣢क्रतो । सु । क्रतो पृण ॥५२॥

Mantra without Swara
अध ज्मो अध वा दिवो बृहतो रोचनादधि । अया वर्धस्व तन्वा गिरा ममा जाता सुक्रतो पृण ॥

अध । ज्मः । अध । वा । दिवः । बृहतः । रोचनात् । अधि । अया । वर्धस्व । तन्वा । गिरा । मम । आ । जाता । सुक्रतो । सु । क्रतो पृण ॥५२॥

Samveda - Mantra Number : 52
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(जात सुक्रतो) हे प्रसिद्ध तथा सुकर्मवाले! “क्रतुः कर्मनाम” [निघं॰ २.१] तू (अध ज्मः-अधःवा बृहतःरोचनात्-दिवः-अधि) अथवा पार्थिव वस्तुओं में वर्तमान “ज्मा पृथिवी” [निघं॰ १.१] अथवा महान् प्रकाशमान द्युलोक में द्युलोकस्थ तारामण्डल में वर्तमान तेरे गुणों से (मम गिरा) मेरी स्तुति से (अया तन्वा वर्धस्व) इस अपनी द्यावापृथिवीमयी एक पाद काया से “पादोऽस्य विश्वा भूतानि” [ऋ॰ १०.९०.३] मेरे अन्दर बढ़कर साक्षात् हो (पृण) इस प्रकार मुझे तृप्त कर।
Essence
परमात्मन्! पृथिवी की वनस्पतियों, सोना-चाँदी रत्नों, मनुष्य पशु-पक्षी सरिसृपों, सरित् सागर पर्वतों में और द्युलोक के विविध ग्रहतारों में तेरे कृतिगुणों के दर्शन से द्यावापृथिवीमयी सृष्टिरूप तेरी एक पाद काया द्वारा तेरे अनन्त स्वरूपज्ञान से और मेरे द्वारा की गई स्तुति से मेरे अन्दर बढ़-बढ़ कर साक्षात् होता रहे मुझे प्राप्त कर॥८॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिर्मेध्यातिथिश्च (मेधा से परमात्मा में अतनगमन प्रवेश करने वाला या पवित्र हो गति प्रवेश करनेवाला उपासक)॥